आप के लिये जिनवाणी
सामायिक संस्कृत
यो व्यापको विश्वजनीनवृत्ते, सिद्धो विबुद्धो धुतकर्मबन्ध:।
ध्यातो धुनीते सकलं विकारं, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥17॥
न स्पृश्यते कर्मकलंकदोषै यो ध्वांतसङ्घेरिव तिग्मरशिम:।
निरंजनं नित्यमनेकमेकं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥18॥
विभासते यत्र मरीचिमाली, न विद्यमाने भुवनावभासी।
स्वात्मस्थितं बोधमयप्रकाशं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥19॥
विलोक्यमाने सति यत्र विश्व, विलोक्यते स्पष्टमिद विविक्तम्।
शुद्धं शिवं शान्तमनाद्यनन्तं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥20॥
येन क्षता मन्मथमानमूर्च्छा, विषादनिद्राभय-शोक-चिंता:।
क्षतोऽनलेनेव तरुप्रपञ्चस, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥21॥
न संस्तरोऽश्मा न तृणं न मेदिनी,
विधानतो नो फलको विनिर्मित:।
यतो निरस्ताक्षकषाय-विद्विष:,
सुधीभिरात्मैवसुनिर्मलो मत: ॥22॥
न संस्तरो भद्र! समाधिसाधनं,
न लोकपूजा न च सङ्घमेलनम्।
यतस्ततोऽध्यात्मरतो भवानिशं,
विमुच्य सर्वामपि बाह्यवासनाम् ॥23॥
न सन्ति बाह्मा मम केचनार्था
भवामि तेषां न कदाचनाहम्।
इत्थं विनिश्चित्य विषुच्य बाह्यं, स्वस्थ:
सदा त्वं भव भद्र! मुक्तयै ॥24॥
आत्मानमात्मन्यवलोक मानस् त्वं दर्शनज्ञानययों विशुद्ध:।
एकाग्रचित्त: खलु यत्र तत्र, स्थितोऽपि साधुर्लभते समाधिम् ॥25॥
एक: सदा शाश्वतिको ममात्मा, विनिर्मल: साधिगमस्वभाव:।
बहिर्भवा: सन्त्यपरे समस्ता, नशाश्वता: कर्मभवा: स्वकीया: ॥26॥
यस्यास्ति नेक्यम वपुषापि सार्द्धं, तस्यास्ति किं पुत्र-कलत्र-मित्रे:।
पृथक्कृते चर्मणि रोमकूपा:, कुतो हि तिष्ठन्ति शरीरमध्ये ॥27॥
संयोगतो दुःखमनेकभेदं, यतोऽशनुते जन्मवने शरीरी।
तत्स्त्रीधासौ परिवर्जनीयो, यियासुना निर्वृत्तमात्मनीनाम् ॥28॥
सर्व निराकृत्य विकल्प-जालं, संसार-कान्तार निपातहेतुम्।
विविक्तमात्मानमवेक्षय-माणो, निलीयसे त्वं परमात्मतत्वे ॥29॥
स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फल तदीयं लभते शुभाशुभम।
परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ॥30॥
निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किञ्चन।
विचारयन्नेव-मनन्यमानस:, परो ददातीति विमुञ्च शेमुषीम् ॥31॥
येः परमात्माऽमितगतिवन्ध:, सर्वविविक्तो भृशमनवद्य:।
शश्वदधीतो मनसि लभन्ते, मुक्तिनिकेतं विभववरं ते ॥32॥
इति द्वात्रिंशतावृत्तै:, परमात्मानमीक्षते।
योऽनन्यगत-चेतस्को, यात्यसौ पदमव्ययम्॥
सामायिक पाठ-भाषा
( पं. महाचन्दजी कृत)
1- प्रतिक्रमण कर्म
काल अनन्त भ्रम्यो जगमें सहिये दुःख भारी।
जन्म मरण नित, किये पापको ह्वै अधिकारी।।
कोटि भवांतर माहिं मिलन दुर्लभ सामायिक।
धन्य आज मैं भयो योग मिलियो सुख दायक।।1।।
हे सर्वज्ञ जिनेश! हिकये जे पाप जु मैं अब।
ते सब मन-वच-काय-योगकीी गुप्ति विना लभ।।
आप समीप हजूर माहिं मैं खडो खडो सब।
दोष कहुँ सो सुनो करो नठ दुःख देहिं जब।।2।।
क्रोध मान मद लोभ मोह माया वशि प्राणी।
दुःख सहित जे किये दया तिनकी नहिं आनी।।
बीना प्रयोजन एकेन्द्रिय वि ति चउ पंचेन्द्रिय।
आप प्रसादहिं मिटे दोष जो लग्यो मोहि जिय।।3।।
आपसमें इक ठोर थापिकरि जे दुःख दीने।
पेलि दिये पग तलें दाबकरि प्राहण हरीने।।
आप जगतके जीव जिते तिन सबके नायक।
अरज करु मैं सुनो दोष मेटो दुःख दायक।।4।।
अंजन आदिक चोर महा धन घोर पाप मय।
तिनके जे अपराध भये ते क्षमा क्षमा कियक।।
मेरे जे अब दोष भये ते क्षमा दयानिधि।
यह पडिकोणो कियो आदि षटकर्म माहिं विधि।।5।।
2. प्रत्याख्यान कर्म
जो प्रमाद वशि होय विराघे जीव घनेरे।
तिनको जो अपराध भयो मेरे अघ ढेरे।।
सो सब झुठों होउ जेगतपतिके परसादै।
जो प्रसाद तैं मिलै सर्व सुख दुःख न लाघै।।6।।
मैं पापी निर्लज्ज् दया करि हीन महा शठ।
किये पाप अति घोर पाप मति होय चित्त दुठ।।
निदूं हुँ मैं बार बार निज जियको गरहूँ।
सब विधि धर्म उपाय पाय फिर पापहिह करहूँ।।7।।
दुर्लभ है नर जन्म तथा श्रावक कुल भारी।
सत संगति संयोग धर्म जिन श्रद्धा धारी।।
जिन वचनामृत धार समावर्त जिनवानी।
तो हू जीव संहारे धिक धिक धिक हम जानी।।8।।
इन्द्रिय लम्पट होय खोय निज ज्ञान जमा सब।
अज्ञानी जिमि करे तिसि विधि हिंसक ह्वै अब।।
गमनागमन करंतो जीव विराधे भोले।
ते सब दोष किये निंदूं अब मन वच तन तोले।।9।।
आलोचन विधि थकी दोष लागे जु घनेरे।
ते सब दोष विनाश होउ तुम तें जिन मेरे।।
बार बार इस भांति मोह मद दोष कुटिलता।
इर्षादिक तें भये, निंदिये जे भय भीता।।थ्10।।
3- सामायिक कर्म
सब जीवनमें मेरे समाता भाव जग्यो है।
सब जिय मो सम समता राखो भाव लग्यो है।।
आर्त रौद्र द्वय ध्यान छांडि करहूँ सामायिक।
संजम मो कब शुद्ध होय यह भाव बधायक।।11।।
पृथ्वी जल अरु अग्नि वायु चउ काय वनस्पति।
पंचहि थावर माहिं तथा त्रस जीव बसै जित।।
बे इन्द्रिय तिय चउ पंचेन्द्रिय् मांहि जीव सब।
तिनतें क्षमा कराऊं मुझ पर क्षमा करो अब।।12।।
इस अवसरमें मेरे सब सम कंचन अरु तृण।
महल मसान समान शत्रु अरु मित्रहिं सम गणं।
जामन मरण समान जानि हम समता कीनी।
सामायिकका काल जितजै यह भाव नवीनी।।थ्13।।
मेरो है इक आतम तामें ममत जु कीनों।
और सबै मम भिन्न जानि समता रस भीनों।।
मात पिता सुत बन्धु मित्र तिय आदि सबै यह।
मोतै न्यारे जानि जथारथ रुप करयो गह।।14।।
मैं अनादि जग जाल मांहि फंसि रुप न जाण्यो।
एकेन्द्रिय दे आदि जन्तुको प्राण हराण्यो।।
ते सब जीव समूह सुनो मेरी यह अरजी।
भव-भवको अपराध क्षमा कीज्यो कर मरजी।।15।।
4- स्तवन कर्म
नमोऋषभ जिनदेव अजित जिन जीति कर्मको।
सम्भव भव दुखहरणकरण अभिनन्दन शर्मको।
सुमति सुमति दातार तार भव सिंधु पार कर।
पदछ्मप्रभ पद्माभ भानि भव भीति प्रीति धर।।16।।
श्री सुपार्श्व कृत पास नाश भव जास शुद्ध कर।
श्री चन्द्रप्रभ चथ्न्द्रकांति सम देह कान्ति धर।।
पुष्पदन्त दमि दोंष कोष भवि पोष रोष हर।
शीतल शीतल करण हरण भव ताप दोष हर।।17।।
श्रेय रुप जिन श्रेय ध्येय नित सेय भव्य जन।
वासुपूज्य शत पूज्य वासवादिक भव भय हन।।
विमल विमल मति देन अन्तगत है अनन्त जिन।
धर्मशर्म शिवकरणसशांति जिनशांति विधायिन।।18।।
कुन्थु कुन्थु मुख जीव पाल हरनाथ जाल हर।
मल्लि मल्ल सम मोह मल्ल मारन प्रचार धर।।
मुनिसुव्रत व्रत करण नमत सुर संघहिं नमि जिन।
नेमिनाथ जिन नेमि धर्म रथ माहिं ज्ञान धन।।19।।
पार्श्वनाथ जिन पार्श्व उपल सम मोक्ष रमापति।
वर्द्धमान जिन नमूं नमूं भव दुःख कर्म कृत।।
या विधि मैं जिन सघ रुप चउबीस संख्यधर।
स्तवूं नमूं हूं बार बार बंदूं शिव सुखकर।।20।।
5- वन्दना कर्म
वंदूं मैं जिनवीर धीर महावीर सु सनमति।
वर्0मान अतिवीर वंदि हूँ मन वच तन कृत।।
त्रिशला तनुज महेश धीश विद्यापति वन्दूं।
वंदू नित प्रति कनक रुप तनु पाप निकन्दूं।।21।।
सिद्धारथ नृप नन्द द्वन्द दुख दोष्ज्ञ मिटावन।
दुरित दवानल ज्वलित ज्वाल जत जीव उधारन।।
कुण्डलपुर करि जन्म जगत जित आनन्द कारन।
वर्ष बहत्तर आयु पाय सब ही दुःख टारनं।22।।
सप्त हस्त तनु तुंग भंग कृत जन्म-मरण भय।
बाल ब्रह्म मय ज्ञेय हेय आदेय ज्ञान मय।।
दे उपदेश उधारि तारि भव सिंधु जीव धन।
आप बसे शिव मांहिह ताहि बंदो मन वच तन।।23।।
जाके वंदन थकी दोष दुःख दूर हि जावें।
जाके वंदन थकी मुक्ति तिय सन्मुख आवें।।
जाके वंदन थकी वैद्य होवें सुरगनके।
ऐसे वीर जिनेश वंदि हूँ क्रम युग तिनके।।24।।
सामायिक षट् कर्म मांहिं वंदन यह पंचम।
वंदों वीर जिनेन्द्र इनद्र शत वंद्य वंद्या मम।।
जन्म मरण भय हरो करो अघ शांति शांति मय।
मैं अघकोष सुपोष दोष्ज्ञको दोष विनाशाय।।25।।
6- कायोत्सर्ग कर्म
कायोत्सर्ग विधान करुं अन्तिम सुखदाई।
काय त्यजन मय होय काय सबको दुखदाई।।
पूरब दक्षिण नमूं दिशा पिश्चम उत्तर में।
जिन गृह वन्दन करुं हरुं भव पाप तिमिर में।।26।।
शिरोनति में करुं नमूं मस्तक कर धरिकै।
आवर्तादिकं क्रिया करुं मन वच मद हरिकै।।
तीनलोक जिन भवन मांहि जिन है जु अकृत्रिम।
कृत्रिम हैं द्वय अर्द्ध द्वीप मांहीं वन्दों जिम।।27।।
स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा,
फलम् तदीयं लभते शुभाशुभम्।
परेण दत्तं लभ्यते स्फुटं,
स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा।।30।।
अर्थ- पूर्वकालमें आत्मा जो कुछ काम करता है। उसको
ही शुभ व अशुभ फल पाता है। यदि दूसरेेका दिया हुआ
फल प्राप्त हुआ करे तो यह प्रगट है कि अपना किया हुआ
कर्म बेमतलब हो जावे।
निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो,
न कोपि कस्यापि ददाति किंचन।
विचारयन्नेवमनन्यमानसः,
परो ददातीति विमुच्च शेमुषीम्।।31।।
अथ्र- संसारी जीव अपने ही बांधे हुए कर्मोंके फल
पाते है, इसके सिवाय और कोई किसीको भी कुछ नहीं
देता है। ऐसा ही विचार करते हुए दूसरा देता है‘ ऐसी
बुद्धिको त्यागकर एकाग्र चित्त होना योग्य है।
यै परमात्माऽमितगतिवन्द्य, सर्व विविक्तो भृरामनवद्यः।
?शश्वदधीते मनसि लभन्ते, मुक्तिनिकेतं विभववरं ते।।32।।
अर्थ- जो भव्यजीव अमितगति अर्थाात् अपार ज्ञानवाले
गणधरादियोंसे अथवा अमितगति आचार्यसे (ग्रंथकर्तासे)
वन्दनीक, सर्वसे अलग और अतिशय करके प्रसंशनीय
परमात्माको अपने मनमें ध्याते हैं वे जीव मोक्षकी श्रेष्ठ
लक्ष्मी को पाते है।
इति द्वात्रिंशतिवृत्तैः परमात्मानमीक्षते।
योऽनन्यगतचेतस्को, यात्मसौ पदमव्ययम्।।33।।
अर्थ- जो भवयजीव उपर कहे हुए 32 श्लोकों द्वारा
एकचित हो परमात्माका अनुभव करता है, वह जीव अविनाशी
पदको प्राप्त करता है।
।।इति सासायिक पाठ सम्पूर्णम्।।