दर्शन पाठ (अर्थ सहित)
दर्शनं देवदेवस्य, दर्शनं पापनाशनम्।
दर्शनं स्वर्गसोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनम्॥(1)
दर्शनं = दर्शन
पापनाशनम् =पापों का नाश
स्वर्गसोपानं=स्वर्ग की सीढ़ी
मोक्षसाधनम् =मोक्ष का साधन
अर्थ: देवों के देव देवाधिदेव अर्थात इसमे चार गति है। इसमें
एक गति है देवगति, देवगति में भी चार प्रकार के देव होते है भवनवासी, व्यन्तर वासी, ज्योतिषी, वैमानिक, ऐसे चारों निकाय के देव भी जिनकी पूजा वंदना करते है ऐसे वीतरागी जिनेन्द्र देव की चर्चा कर रहे है ऐसे उन देवाधिदेव का दर्शन करना , अवलोकन करना देखना अर्थात श्रद्धा आस्था पूर्वक जो अवलोकन किया जाता है उसको दर्शन कहा गया है देवाधिदेव का दर्शन कैसा है पांच पापो को नाश करने वाला है हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह जो व्यक्ति ये पांच पाप करता है अथवा पांच पाप करने से अशुभ कर्म का संचय होता है,वह कर्म भी जिनेन्द्र भगवान के दर्शन नष्ट होता है ।अथवा जो पाप प्रवृत्तियां हे वह प्रवृत्तियां भी छूट जाती है। जब हम वीतराग देव का दर्शन करते हे जिनेन्द्र देव का दर्शन करते हैं जो हमारे पांच पाप करने की इच्छाए है वह भी कम होती चली जाती है अथवा जो पूर्व में बंधा हुआ जो पाप कर्म है। उसकी अनभाग शक्ति जो शक्ति होती है वह भी कम हो जाती हो अथवा नष्ट हो जाती है और कैसा है जिनेन्द्र देव का दर्शन, दर्शनं स्वर्गसोपानां जो जिनेन्द्र देव का दर्शन करता है। निश्चित उसका मरण होने के पश्चात उसे स्वर्ग सम्पदा ही मिलती है मिथ्यादृष्टिभी दर्शन करेगा तो भी स्वर्ग का लाभ होगा, अगर सम्यकदृष्टि यदि दर्शन करता है तो निश्चित ही वह वैमानिक स्वर्गो में जा करके वह देव पद को प्राप्त करता है और कैसा है दर्शन मोक्ष साधनम् मोक्ष किसे कहते हैं आठों कर्मों से छूट जाना अथवा संसार के दुखों से छूट जाना पूर्णतया मुक्त हो जाना इसका नाम है मोक्ष हे जिनेंद्र भगवान का जो दर्शन है वह परंपरा से मुक्ति का साधन बनता है जो नियमित रूप से जिनेंद्र भगवान का दर्शन करता है मुझे भी आपके जैसा बनना है ऐसा भाव उसके मन में उत्पन्न होता है और वह दिगंबर मुनि बन कर के और अशुभ कर्मों का क्षय करके और मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।
दर्शनेन जिनेन्द्राणां, साधूनां वन्दनेन च।
न चिरं तिष्ठते पापं, छिद्रहस्ते यथोदकम्॥(2)
दर्शनेन = दर्शन से
जिनेंद्राणां= जिनेंद्र देव के
साधुनां = साधुओं की
वंदनेन =वंदना से
च = और
न तिष्ठति= नहीं ठहरते हैं
चिरं=चिरकाल तक
पापं=पाप
छिद्र हस्ते = छिद्र सहित हाथों में
यथोदकम =जैसे जल
अर्थ--जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने से और साधुओं की वंदना करने से पाप बहुत काल तक नहीं ठहरते हैं उदाहरण जैसे- जिसकी अंजुलि में छेद हो और उसमें पानी भर दिया जाए और पानी अंजुलि में कितनी देर तक ठहरेगा और थोड़ी देर में भी पानी अंजुलि से रिक्त हो जाएगा । इसी प्रकार जो जिनेंद्र भगवान के दर्शन करता है उसके जीवन में पाप ज्यादा समय तक नहीं ठहरता है क्योंकि संसार में कोई भी ऐसा प्राणी नहीं है जो कि पाप से युक्त न हो और वही पाप जब छोड़ देता है तो वह परमात्मा बन जाता है तो जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने से जो पाप हमारे संचित हैं जो हमारे पाप प्रवृतियां हैं ।वह धीरे-धीरे छूटती चली जाती है और वह व्यक्ति जो पापी था वह भी पाप को छोड़कर परमात्मा बन जाता है
वीतराग – मुखं दृष्ट्वा, पद्मरागसमप्रभम्।
जन्मजन्मकृतं पापं, दर्शनेन विनश्यति॥(3)
वीतराग-मुखं =वीतराग भगवान के मुख को
द्रष्टवा=देखकर
पद्मराग-सम्= पद्म रागमणि के समान
प्रभं=प्रभायुक्त
जन्म-जन्म क्रतं= जन्म जन्मांतर में किए गए
दर्शनेन = दर्शन से
विनश्यति=नष्ट हो जाते हैं
अर्थ-- जिनेंद्र भगवान का जो दर्शन है। बताते हुए कह रहे हैं पदम् राग समप्रभम अर्थात पद्म राग मणि के समान कांति से युक्त हैं । वीतराग भगवान के मुख्य को देखकर अथवा देखने से वीतराग भगवान का मुख कैसा है तो पद्म राग की क्रांति के समान जिनका मुख है ऐसे मुख को देखने पर जन्म जन्म में किए हुए पाप जन्म जन्म अर्थात जन्म जन्मांतर में पूर्व हमने कितना पाप किया है पूर्व जन्म में हमें पता नहीं है किंतु अनादिकाल से यह जीव है और आगे भी अनंत काल तक रहेगा हम अभी तक संसारी बने हुए हैं अर्थात हमने जन्म जन्मांतर में कितने पाप किए हैं हमें पता नहीं वे सारे के सारे पाप दर्शन करने से नष्ट हो जाते हैं । आगम में लिखा है जिनेंद्र भगवान जिन प्रतिमा के दर्शन करने से भी निधरतिर और निकाचित कर्मों का क्षय देखा जाता है अथवा जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने से पूर्व में संचित जो पाप कर्म है वे भी क्षण मात्र में भी नष्ट हो जाते हैं वह हमारी विशुद्धि और हमारे परिणाम पर आधारित है यहां तक कि मेढक , गाय , भैंस , सूकर हे ऐसे तिर्यंचों को भी भगवान के दर्शन करने से समय दर्शन की उपलब्धि हो जाती है ऐसा आगम हमारे सामने उपलब्ध है इस प्रकार से हमें जिनेंद्र भगवान की महिमा को हमें समझना चाहिए
दर्शनं जिनसूर्यस्य, संसार-ध्वान्तनाशनम्।
बोधनं चित्तपद्मस्य, समस्तार्थ-प्रकाशनम्॥(4)
दर्शनं= दर्शन
जिन सूर्यस्य=जिनेंद्र रूपी सूर्य का
संसार ध्वांत=संसार रूपी अंधकार
नाशनम् =नाश करने वाला
बोधनं= विकासक
चित्त पद्मस्य =मन रुपी कमल का
समस्तार्थ=समस्त पदार्थों
प्रकाशनम्= प्रकाशक
अर्थ -जिनेंद्र रुपी सूर्य का दर्शन अर्थात संसार संबंधी जो अंधकार है वह कौन सा अधिकार है । संसार संबंधी यहां सबसे ज्यादा अज्ञान रूपी अंधकार फैला हुआ है। अथवा मिथ्यात्व रुपी जो अंधकार फैला हुआ है वह नाश को प्राप्त हो जाता है अज्ञान ज्ञान के रूप में अथवा मिथ्यात्व सम्यक्त्व के रूप में परिवर्तित हो जाता है जो जिनेंद्र रूपी भगवान का दर्शन वह संसार संबंधी अंधकार को नष्ट करने वाला है बोधनं चित्त पद्मस्य अर्थात मन रूपी कमल का विकाशक विकास करने वाला है जैसे सूर्य उदय होने पर तालाब में रहने वाला कमल खिल जाता है उसी प्रकार जो सम्यक दृष्टि भव्य जीव होता है जैसे ही जिनेंद्र भगवान का दर्शन करता है वैसे ही मन रूपी कमल आनंद से भर जाता है।
जैसे पूर्व में पढ़ा या धन्य घड़ी यो धन्य जन्म् मेरो भयो ऐसी उसकी परिणति हो जाती है मन गद-गद हो जाता है मन की प्रसन्नता के कारण अशुभ कर्म का क्षय और पुण्य का प्रारंभ हो जाता है और कैसा है जिनेंद्र भगवान का दर्शन समस्त पदार्थों का प्रकाशक है अर्थात जीव अजीव आदि जो नौ पदार्थ कहे गए हैं अथवा संसार की जितनी भी वस्तुएं हैं उन सब का समीचीन ज्ञान होने लगता है उन सब को प्रकाशित करने वाला वह जिनेंद्र देव का दर्शन है जैसे ही में मिथ्यात्व रूपी अंधकार समाप्त हो जाता है वस्तु स्वरूप का हमें बोध ज्ञान होने लगता है इस प्रकार से हमें जिनेंद्र भगवान का दर्शन समझना चाहिए
दर्शनं जिनचन्द्रस्य, सद्धर्मामृत-वर्षणम्।
जन्म-दाहविनाशाय, वर्धनं सुखवारिधे:॥(5)
दर्शन = (दर्शन)
जिन चन्द्रस्य = (जिनेन्द्र रूपी चन्द्रमा)
सद् = (सत्य / समीचीन)
धर्माम्रत = (धर्म रूपी अमृत) वर्षणम् = (वर्षा करने वाला), विनाशाय - ( विनाश करने के लिए),
सुख वारिधे: =(सुख रूपी समुद्र की)
जन्म-दाह - (जन्म रूपी ताप का)
वर्धनं = (वृद्धि के लिए)
अर्थ = चन्द्रमा के समान श्री जिनेन्द्र देव के दर्शन करने से समीचीन धर्म रूपी अमृत की वर्ष
करने वाला है। जैसे पूर्णिमा का चन्द्रमा जो होता हो सुधा यानि अमृत को बरसाता है। उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान रूपी चन्द्रमा का दर्शन करने से समीचीन धर्म रूपी अमृत वर्षा होती है। जिससे
सही धर्म क्या है हमें पता चल जाता है ।जन्मदाहविनाशाय अर्थात जन्म रूपी दाह को अर्थात ताप को नष्ट करने वाला है। यह जिनेन्द्र भगवान का दर्शन जैसे चन्द्रमा के उदय से शीतलता हो जाती है उसी प्रकार जिन चन्द्र के दर्शन करने से जन्म रूपी जो ताप है। संसार के जन्म के दुःख और अज्ञान संबंधी अंधकार से जो उत्पन्न होने वाला जो कष्ट है। वह सब जिनेन्द्र रूपी चन्द्रमा के दर्शन करने से नष्ट हो जाता है। और कैसा है दर्शन
सुख रूपी समुद्र की वृद्धि करने वाला है। जैसे चन्द्रमा उदित होता है तो बताते है समुद्र बृद्धि को प्राप्त हो जाता है। उसी प्रकार जो भव्य आत्मा है। जिनेन्द्र भगवान के दर्शन करता है। तो उसके भीतर से आत्मिक सुख और सांसारिक सुख दोनों की वृद्धि होने लगती है। ऐसे ही जिनेन्द्र रूपी चन्द्रमा का दर्शन हितकारी होता है।
जीवादितत्त्व प्रतिपादकाय, सम्यक्त्व मुख्याष्टगुणाश्रयाय।
प्रशान्तरूपाय दिगम्बराय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय॥(6)
जीवादि = (जीव आदि)
, तत्व = (तत्वों के),
प्रतिपादकाय - प्रतिपादक के लिए
सम्यक्त्व - (सम्यक्त्व)
मुख्याष्ट =(अष्ट मुख )
गुणार्णवाय =( गुणों के समुद्र के लिए),
प्रशान्तरूपाय -( प्रशान्त रुप के लिए )
दिगम्बराय - (दिगम्बर के लिए), देवाधिदेवाय = ( देवाधिदेव के लिए)
अर्थ -जीवादि सात तत्वों का प्रतिवादन करने वाले जो 'है वो जिनेन्द्र भगवान है उन्होंने जीव अजीब, आश्रव ,बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष इन सात
- तत्वों का व्याख्यान किया है ऐसे जिनेन्द्र भगवान के लिए और कैसे हे सम्यक्त्व आदि आठ गुणों के मुख्यतः जी समुद्र है। अर्थात जिनके पास मुख्य रूप से आठ गुण है। कौन- कौन से सम्यक्त्व क्षायिक दर्शन, क्षायिक सम्यवत्व,
क्षायिक दर्शन,क्षायिक ज्ञान, क्षायिक वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व ,अव्यावादत्व ,
अगुरुलघुत्व,ऐसे
उन्होंने आठ गुणों को प्राप्त सिद्धव को प्रात किया है। ऐसे जिनेन्द्र भगवान रूपीं समुद्र के लिए और जिनकी मुद्रा कषायों के समन को प्रकट कर रही है अर्थात जिनेन्द्र भगवान की मुद्रा देखने से ही कषायों की मंदता कषायों का अभाव प्रगट होता है शांत जिनकी मुद्रा प्रकण्ठ रूप से शांत पने को धारण करने वाले जिनकी मुद्रा है ऐसे दिशा ही जिनका अम्बर वस्त्र
ऐसे दिगम्बत्व रुप के लिए देवो के जो देव है। ऐसे जिनेन्द्र देव के लिए जिन्होंने अपनी पांचो इन्द्रियों को जीत लिया है। ऐसे जिनेन्द्र भगवान के लिए मेरा नमस्कार हो ऐसे जिनेन्द्र भगवान की में नमस्कार करता हु
चिदानन्दैक – रूपाय, जिनाय परमात्मने।
परमात्मप्रकाशाय, नित्यं सिद्धात्मने नम:॥(7)
चिदानन्देक-रुपाय = (चित्त आनंद स्वरूप )
जिनाय = (जिनके (जिनके लिए),
परमात्मने = (परम उत्कृष्ट आत्मा के लिए )
परमात्म प्रकाशाय = (परम आत्म तत्व के प्रकाश के लिए) सिद्धात्मने - (सिह आत्मा के लिए)
नमः = (नमस्कार हो)
नित्या= (हमेशा)
अर्थ - उन सिद्धात्मा को नमस्कार हो अर्थात कैसे है वे 'सिद्ध भगवान चैतन्य से उत्पन्न होने वाला आनन्द ही जिनका स्वरूप है अर्थात आत्मानंद में जो लीन रहने वाले है ऐसे सिद्ध भगवान जिन्होंने कर्मो को जीत लिया है ऐसे जिनेन्द्र भगवान उत्कृष्ट आत्म स्वरूप को जिन्होंने प्राप्त कर लिया है। परम आत्म तत्व के स्वरूप को जो प्रकाशन करने वाले है उनके लिए अर्थात तीर्थकर जो होते है स्वयं आत्म स्वरूप को उन्होंने प्राप्त कर लिए है। और अपनी कि दिव्य ध्वनि के माध्यम से संसार के सभी जीवों के लिए सिद्धात्मा का क्या स्वरूप होता है जिसको जो बतलाने वाले है ऐसी जिनेंद्र भगवान के लिए अथवा जिन्होंने सिद्धत्व को प्राप्त कर लिया है ऐसे सिद्ध भगवान को हमारा नमस्कार हो क्योंकि परमात्मा कहने से दो प्रकार के हो गये एक अरिहंत भगवान एक सिद्ध भगवान, अरिहंत भगवान वो होते है जो शरीर सहित होते हैं। सिद्ध भगवान वो होते हैं जो शरीर रहित होते हैं। अरिहंत भगवान को सकल परमात्मा कहते हैं। सिद्ध भगवान को निकल परमात्मा कहते हैं
अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम।
तस्मात्कारुण्यभावेन, रक्ष रक्ष जिनेश्वर:॥(8)
अन्यथा = (आपके शिवा ),
शरणं= (शरण)
नास्ति= (नहीं हे)
तस्मात् =(इसलिए)
, रक्ष रक्ष जिनेश्वर =(हे जिनेश्वर करो)
अर्थ - यहां पर भावना भाई जा रही है हे भगवन आपको छोड़ कर के और कोई भी मेरे लिए शरण नहीं है। आपके शिवा अन्य कोई हमारे लिए संसार में शरण अथवा सहारा देने वाला नहीं है
आप ही मेरे लिए शरण है आपके शिवा कोई और शरण नहीं है किंतु आप ही मेरे लिए शरण है सहारा देने वाले हैं इसीलिए करुणा भाव से दया भाव से सहित होकर के हे जिनेंद्र भगवान आप मेरी रक्षा करें
न हि त्राता न हि त्राता, न हि त्राता जगत्त्रये।
वीतरागात्परो देवो, न भूतो न भविष्यति॥(9)
जगत्त्रयए= (तीन लोक में)
वीतरागात्पर: देव:=( वितरक अरिहंत के सिवाय और कोई देव)
न हि त्राता = ( जीवो की रक्षा करने वाला नहीं है)
न हि त्राता=( रक्षा करने वाला नहीं है)
न हि त्राता= ( रक्षा करने वाला नहीं)
ना भूत न भविष्यति=( नाम भूतकाल में और न भविष्य में होंगे)
अर्थ--हे भगवान तीन लोक में ऊधर्व लोक, मध्यलोक, अधो लोक में इन तीनों लोकों में वीतराग भगवान को छोड़ कर के अन्य कोई भी देवी देवता आदि रक्षक नहीं है नहीं है नहीं है अर्थात वास्तव में मन से वचन से काम से हमें इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि वीतराग देव को छोड़ कर के और कोई भी इस दुनिया में हमारा रक्षक नहीं है नहीं है नहीं है ना भूतो ना भविष्यति न पहले था न कभी भविष्य में कभी होगा न वर्तमान में हे इसी श्रद्धा का नाम सम्यकदर्शन है। कि हे भगवन वीतराग देव के समान कोई हमारा रक्षक न था न हे और न रहेगा इतनी श्रृद्धा हमारे भीतर हो गयी तो निश्चित मानना हमारे लिए सम्यकदृष्टि की उपलब्धि होने में देर लगने वाली नहीं है अन्यथा तो हमारी दशा यह है कि गंगा गये तो गंगा दास जमुना गये तो जमुना दास, जहां हम जाते वही अपना माथा झुका देते किंतु सच्चा सम्यकद्रष्टि वो होता हे जो वीतराग देव, शास्त्र, गुरु के अलावा अपना माथा कहीं नहीं झुकाता है। किसी झुकाता है। किसी को अपना रक्षक नही मानता | हर संकट संकट के क्षणों में मात्र यदि कोई हमारी रक्षा करने वाला है एक मात्र वीतराग देव है। इसलिए निरन्तर हमेशा हमें हर परिस्थिति में वीतराग, देव, शास्त्र, गुरु की ही वंदना पूजा स्तुति आराधना करना चाहिए वहीं मात्र हमारे रक्षक है।
जिने भक्तिर्जिने भक्तिर्जिने भक्ति-र्दिनेदिने।
सदा मेऽस्तु सदा मेऽस्तु,सदा मेऽस्तु भवे भवे॥(10)
जिने भक्ति=( जिन भक्ति)
दिने दिने=( प्रतिदिन)
भवे-भवे =(भव भव में)
सदामेऽस्तु=( सदा हो),
अर्थ -हे भगवान प्रत्येक दिन में प्रतिदिन में प्रत्येक भव में जब तक मुझे मोक्ष न मिले मेरी भक्ति जो है जिनेंद्र भगवान में भक्ति बनी रहे अर्थात जिनेंद्र भगवान के प्रति मेरी भक्ति बनी रहे सदामेऽस्तु सदा होवे सदा होवे सदा होवे अर्थात प्रत्येक दिन में ,प्रत्येक भव में और हमेशा से मेरी भक्ति जिनेंद्र भगवान के प्रति बनी रहे ऐसी यहां पर भावना भाई जा रही है
जिनधर्मविनिर्मुक्तो, मा भवेच्चक्रवर्त्यपि ।
स्याच्चेटोऽपि दरिद्रोऽपि, जिनधर्मानुवासित:॥(11)
जिनधर्म=(जिन धर्म से)
विनिर्मुक्त:=( रहित)
चक्रवर्त्यपि=(चक्रवर्ती भी)
मा भवेत्=( नहीं हो)
स्याच्चेटोऽपि =(भले ही दुखी हो)
दरिद्रोऽपि =(दरिद्री भी हो लेकिन)
जिनधर्मानुवासित:=(जिन धर्म सहित मेरा जीवन हो)
अर्थ -जिन धर्म से रहित चक्रवर्ती भी अर्थात नही होऊ अर्थात चक्रवर्ती की सम्पदा भी मुझे मिल जाये और जैन धर्म न रहे तो मुझे चक्रवर्ती सम्पदा नहीं चाहिए चक्रवर्ती कौन होता है छ: खण्ड का अधिपति होता है तथा 18 करोड़़ घोड़े 84 लाख हाथी और 96हजार रानीयां ऐसा जो 6 खण्ड का अधिपति होता है। ऐसे विशाल वैभव को दारने
वाला चक्रवर्ती का पद भी मुझे नहीं चाहिए यदि जिन धर्म से रहित हो जाऊं और चक्रवर्ती की सम्पदा मुझे भी मिले मुझे नहीं चाहिए गरीब भी हो जाऊं जिनधर्म में हमेशा मेरा निवास बना रहे अथवा जिनधर्म से सहित मेरा शुभाषित, जिन धर्म से सहित मेरा जीवन बना रहे यहां पर कितनी बड़ी बात कह दी है आज थोड़े से धर्म परिषह से कमाने के लिए हम ऐसे दूर-दूर नगरों में शहरों में महानगरों में यहां तक कि विदेश में भी जाकर बस जाते हैं लेकिन जिन धर्म हमसे छूट गया ऐसे ही संपत्ति भी हमारे कोई काम की नहीं है
और यहां पर यही भावना भाई जा रही है कि हे भगवान भले ही मैं गरीब हो जाऊं किंतु मुझसे जिन धर्म में ना छूटे आज हम देख रहे हैं कि छोटे-छोटे गांव में नगरों में जहां पर पास पास में मंदिर है सब कुछ है धर्म में ध्यान का साधन है किंतु थोड़ा साधन पैसा व्यक्ति को मिलने लगता है तो जिन धर्म को जिन मंदिर को छोड़कर के मात्र धन के पीछे चला जाता है लेकिन ध्यान रखना धन हमारे लिए सुख का कारण नहीं है
"रही आपदा संपदा, प्रभु से हमें मिलाए।
और रही संपदा आपदा, प्रभु से हमें छुड़ाएं।।
अर्थात वह विपत्ति ही संपत्ति है जो हमें भगवान से मिला देती है वह संपत्ति यानी विपत्ति दुःख का कारण जो हमें भगवान से छुड़ा लेती है
जन्मजन्मकृतं पापं, जन्मकोटिमुपार्जितम्।
जन्ममृत्युजरा-रोगं, हन्यते जिनदर्शनात्॥(12)
जिनदर्शनात्=(जिनेंद्र भगवान के दर्शन)
जन्मजन्मकृतं पापं,=(जन्म जन्मांतर में किए गए पाप)
कोटिमुपार्जितम्=(, करोड़ उपार्जित)
जन्ममृत्युजरा-रोग:=( जन्म ,
मरण,बुढ़ापा तथा रोग)
हन्यते =(नष्ट हो जाते)
अर्थ-- जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने से जन्म-जन्मांतर में किए हुए पाप अथवा करोड़ों जन्मों में उपार्जित जो पाप है अथवा जन्म मरण बुढ़ापा रूपी जो रोग है वह नष्ट हो जाते हैं अथवा जिनेंद्र भगवान के दर्शन से करोड़ों जन्म में उत्पन्न हुए पाप भी नष्ट हो जाते हैं जन्म मरण बुढ़ापा रूपी जो रोग है वह भी नष्ट हो जाता है
अद्याभवत् सफलता नयन-द्वयस्य,
देव ! त्वदीय चरणाम्बुज वीक्षणेन।
अद्य त्रिलोक-तिलक ! प्रतिभासते मे,
संसार-वारिधिरयं चुलुक-प्रमाणम् ॥(13)
देव =( हे जिनदेव)
त्वदीय=( आपके)
चरणाम्बुज=( चरण कमल)
वीक्षणेन=( देखने से)
अघ=( आज)
नयन-द्वयस्य,=( दोनों नेत्र)
सफलता अभवत=( सफल हुए हैं)
त्रिलोक-तिलक=(हे तीन लोक के स्वामी)
अयं=( आज)
संसार-वारिधि:=( संसार समुद्र)
चुलुक-प्रमाणम:=( चुल्लू प्रमाण)
प्रतिभासते =( लगता है)
अर्थ--हे देव जिनदेव आपके चरण कमल को देखने से आज मेरे दोनों नयन की सफलता हुई है हे तीन लोक के तिलक स्वरूप आज मेरा यह संसार रूपी समुद्र चुल्लू प्रमाण प्रतिभाषित है यहां पर कह रहे हैं कि हे भगवन आपके चरण कमल का मैंने जब से दर्शन कर लिया है अतः आज मेरे दोनों नयन सफल हो गए हैं हे तीन लोग के नाथ मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मेरा संसार रूपी समुद्र जो था चुल्लू प्रमाण चुल्लू मतलब जो एक हाथ की अंजुलि बांधते हैं उसे चुल्लू कहते हैं जैसे संसार रूपी समुद्र के जल को सुखा करके चुल्लू प्रमाण कर दिया गया हो ऐसा मुझे लग रहा है
क्योंकि आगम कहता है की जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने से जो सम्यकरूप परिणति होती है उसके द्वारा जो अनंत संसार जो होता है नष्ट होकर के अर्ध पुद्गल परावर्तन के प्रमाण मात्र बचता है
अर्ध पुद्गल परावर्तन यानी एक समुद्र को सुखा करके एक चुल्लू भर में जैसे पानी आ जाता है उसी प्रकार अनंत संसार भी बहुत थोड़ा सा बचता है और शीघ्र ही बस संसार के दुखों से मुक्ति प्राप्त करके भगवन पद को प्राप्त कर लेता है