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भाग १: आहार मार्गणा - परिचय (१-२०)
१. आहार मार्गणा किसे कहते हैं?
उत्तर: जीव द्वारा शरीर निर्माण के योग्य पुद्गल परमाणुओं को ग्रहण करने या न करने के विचार को।
२. आहार मार्गणा के मुख्य कितने भेद हैं?
उत्तर: दो (आहारक और अनाहारक)।
३. 'आहारक' जीव किसे कहते हैं?
उत्तर: जो जीव नौकर्म पुद्गलों (शरीर, पर्याप्ति के योग्य परमाणु) को ग्रहण करता है।
४. 'अनाहारक' जीव किसे कहते हैं?
उत्तर: जो जीव आहार (नौकर्म पुद्गल) ग्रहण नहीं करता।
५. संसारी जीव आहारक कब होता है?
उत्तर: विग्रह गति के समय को छोड़कर शेष सभी समय में।
६. जीव के विग्रह गति (मरण के बाद नई योनि में जाने का रास्ता) में कौन सी अवस्था होती है?
उत्तर: अनाहारक।
७. आहार मार्गणा का वर्णन किस महान ग्रंथ में विस्तार से मिलता है?
उत्तर: गोम्मटसार जीवकांड।
८. क्या सिद्ध भगवान आहारक हैं?
उत्तर: नहीं, वे सदा अनाहारक होते हैं।
९. कर्माहार किसे कहते हैं?
उत्तर: आठों प्रकार के कर्मों का ग्रहण करना।
१०. नोकर्माहार का क्या अर्थ है?
उत्तर: शरीर और इंद्रियों के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करना।
११. जैन दर्शन में कितने प्रकार के आहार बताए गए हैं?
उत्तर: छह (६)।
१२. क्या संसारी जीव कभी कर्म ग्रहण करना बंद करता है?
उत्तर: नहीं, केवल १४वें गुणस्थान और सिद्ध अवस्था में।
१३. आहार मार्गणा का संबंध किस शरीर से मुख्य रूप से है?
उत्तर: औदारिक, वैक्रियक और आहारक शरीर से।
१४. विग्रह गति में जीव कितने समय तक अनाहारक रह सकता है?
उत्तर: जघन्य १ समय, उत्कृष्ट ३ समय।
१५. चौथे समय में जीव नियम से क्या हो जाता है?
उत्तर: आहारक।
१६. क्या जन्म के पहले समय में जीव आहारक होता है?
उत्तर: हाँ।
१७. आहारक अवस्था का जघन्य काल कितना है?
उत्तर: एक समय।
१८. आहारक अवस्था का उत्कृष्ट काल कितना है?
उत्तर: ३३ सागर से कुछ अधिक।
१९. अनाहारक अवस्था का उत्कृष्ट काल कितना है?
उत्तर: ३ समय।
२०. क्या नारकी जीव अनाहारक होते हैं?
उत्तर: केवल विग्रह गति में, नरक पहुँचने पर वे आहारक हो जाते हैं।
भाग २: आहार के ६ भेद (२१-४०)
२१. कवलाहार किसे कहते हैं?
उत्तर: जो भोजन ग्रास (कौर) बनाकर मुँह से खाया जाए।
२२. कवलाहार किन जीवों के होता है?
उत्तर: मनुष्यों और तिर्यंचों (पशुओं) के।
२३. लेपाहार क्या है?
उत्तर: शरीर पर लेप करने या त्वचा द्वारा सोखने वाला आहार (जैसे वृक्ष)।
२४. ओजाहार किसे कहते हैं?
उत्तर: पक्षियों के अंडों को जो माता-पिता के स्पर्श या गर्मी से पोषण मिलता है।
२५. मानसाहार (मानसिक आहार) किनके होता है?
उत्तर: देवों के (जब उनके मन में इच्छा होती है और कंठ से अमृत झरता है)।
२६. क्या देवों को भूख लगती है?
उत्तर: हाँ, लेकिन वे मानसिक आहार से तृप्त होते हैं।
२७. कर्माहार किन जीवों के होता है?
उत्तर: सभी संसारी जीवों के (चाहे वे आहारक हों या अनाहारक)।
२८. नोकर्माहार किनके नहीं होता?
उत्तर: सिद्धों के और विग्रह गति के जीवों के।
२९. क्या वृक्ष आहार लेते हैं?
उत्तर: हाँ, वे लेपाहार लेते हैं।
३०. केवली भगवान के कौन सा आहार माना जाता है?
उत्तर: केवल कर्माहार और नोकर्माहार (दिगंबर मत के अनुसार कवलाहार नहीं)।
३१. नरक में कैसा आहार होता है?
उत्तर: वहाँ केवल कर्माहार और नोकर्माहार होता है (मानसिक या कवलाहार नहीं)।
३२. पर्याप्त जीव किसे कहते हैं?
उत्तर: जिसकी शरीर बनाने की शक्तियाँ पूर्ण हो गई हों।
३३. क्या अपर्याप्त जीव आहारक होता है?
उत्तर: हाँ, विग्रह गति के बाद वह आहारक हो जाता है।
३४. गर्भज जीवों का प्रारंभिक आहार क्या है?
उत्तर: माता के रज और पिता के वीर्य से बना कलल।
३५. सम्मूर्छन जीवों का आहार क्या होता है?
उत्तर: आसपास के पुद्गल परमाणु।
३६. ओजाहार का संबंध किस योनि से है?
उत्तर: अंडज योनि से।
३७. क्या सिद्धों के कर्माहार होता है?
उत्तर: नहीं।
३८. आहारक शरीर (ऋद्धिधारी मुनि का) कैसा होता है?
उत्तर: शुभ, विशुद्ध और एक हाथ ऊँचा।
३९. आहारक शरीर के परमाणु कहाँ से ग्रहण किए जाते हैं?
उत्तर: आहार मार्गणा के माध्यम से।
४०. क्या विग्रह गति में जीव पुद्गल ग्रहण करता है?
उत्तर: कर्म पुद्गल ग्रहण करता है, पर शरीर योग्य नोकर्म नहीं।
भाग ३: गुणस्थान और मार्गणा (४१-६०)
४१. पहले गुणस्थान में जीव कैसा होता है?
उत्तर: आहारक और अनाहारक दोनों (विग्रह गति की अपेक्षा)।
४२. १३वें गुणस्थान (सयोग केवली) में जीव क्या है?
उत्तर: सामान्यतः आहारक, पर समुद्घात के समय अनाहारक।
४३. समुद्घात के किन समयों में केवली अनाहारक होते हैं?
उत्तर: कपाट, प्रतर और लोकपूरण अवस्था में।
४४. १४वें गुणस्थान में जीव क्या होता है?
उत्तर: नियम से अनाहारक।
४५. अयोग केवली आहार ग्रहण क्यों नहीं करते?
उत्तर: क्योंकि उनके योगों का निरोध हो चुका होता है।
४६. क्या आठवें गुणस्थान में जीव अनाहारक हो सकता है?
उत्तर: नहीं, वह आहारक ही रहता है।
४७. मोक्ष प्राप्त करने से ठीक पहले जीव की क्या संज्ञा है?
उत्तर: अनाहारक।
४८. विग्रह गति में कार्मण काययोग के समय जीव क्या कहलाता है?
उत्तर: अनाहारक।
४९. आहारक मार्गणा का स्वामी कौन है?
उत्तर: संसारी जीव।
५०. क्या आहारक जीव के कर्मों का बंध होता है?
उत्तर: हाँ।
५१. अनाहारक अवस्था में कौन सा योग होता है?
उत्तर: कार्मण काययोग।
५२. क्या अनाहारक जीव के आयु कर्म का बंध हो सकता है?
उत्तर: नहीं, आयु बंध केवल आहारक अवस्था में होता है।
५३. पर्याप्तक अवस्था में जीव क्या होता है?
उत्तर: आहारक।
५४. निर्वृत्ति-अपर्याप्त अवस्था में जीव क्या होता है?
उत्तर: आहारक।
५५. लब्धि-अपर्याप्त जीव कैसा होता है?
उत्तर: आहारक।
५६. मार्गणा के अनुसार जीव की खोज क्यों की जाती है?
उत्तर: जीव के स्वरूप और गति को समझने के लिए।
५७. क्या देव विग्रह गति में अनाहारक होते हैं?
उत्तर: हाँ।
५८. आहार मार्गणा का संबंध किस पर्याप्ति से है?
उत्तर: आहार पर्याप्ति से।
५९. आहारक अवस्था में जीव कितने प्राणों को धारण कर सकता है?
उत्तर: २ से १० प्राणों तक।
६०. अनाहारक अवस्था में कितने प्राण होते हैं?
उत्तर: केवल ३ प्राण (आयु, श्वासोच्छवास और कायबल)।
भाग ४: सूक्ष्म विचार और अवस्थाएं (६१-८०)
६१. शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने से पहले जीव क्या कहलाता है?
उत्तर: आहारक (परंतु अपर्याप्त)।
६२. क्या केवली भगवान को भूख की वेदना होती है?
उत्तर: नहीं (दिगंबर जैन धर्म के अनुसार)।
६३. अनाहारक अवस्था में जीव का गमन कैसा होता है?
उत्तर: ऋजु (सीधा) या विग्रह (मोड़ वाला)।
६४. ऋजु गति में जीव कितने समय अनाहारक रहता है?
उत्तर: वह अनाहारक नहीं होता, तुरंत आहारक हो जाता है।
६५. एक मोड़ वाली विग्रह गति में अनाहारक काल कितना है?
उत्तर: १ समय।
६६. दो मोड़ वाली विग्रह गति में अनाहारक काल?
उत्तर: २ समय।
६७. तीन मोड़ वाली गति में अनाहारक काल?
उत्तर: ३ समय।
६८. क्या जीव ४ समय तक अनाहारक रह सकता है?
उत्तर: नहीं।
६९. अनाहारक जीव के किस शरीर का अस्तित्व होता है?
उत्तर: तैजस और कार्मण शरीर का।
७०. आहारक अवस्था में कौन से शरीर होते हैं?
उत्तर: औदारिक या वैक्रियक (तैजस और कार्मण के साथ)।
७१. आहारक मार्गणा में 'नोकर्म' का क्या अर्थ है?
उत्तर: जो कर्म नहीं है, पर शरीर निर्माण में सहायक है।
७२. क्या आहारक जीव के योग होते हैं?
उत्तर: हाँ, मन, वचन और काय योग।
७३. क्या अनाहारक जीव के मन होता है?
उत्तर: द्रव्य मन नहीं होता, भाव मन हो सकता है।
७४. उपपाद शैया पर जन्म लेते समय देव पहले समय में क्या होते हैं?
उत्तर: आहारक।
७५. नरक की पृथ्वी पर पहुँचते ही जीव क्या ग्रहण करता है?
उत्तर: आहार (नोकर्म पुद्गल)।
७६. क्या सिद्ध भगवान आहार के बिना जीवित रहते हैं?
उत्तर: वे जीव-द्रव्य हैं, उन्हें पोषण की आवश्यकता नहीं होती।
७७. आहार मार्गणा में किसका निषेध किया गया है?
उत्तर: अजीव तत्त्व का।
७८. पर्याप्तियों की पूर्णता किसके अधीन है?
उत्तर: आहार ग्रहण करने के।
७९. क्या आहारक अवस्था में जीव का मरण हो सकता है?
उत्तर: हाँ।
८०. क्या अनाहारक अवस्था में जीव मर सकता है?
उत्तर: नहीं, मरण के बाद ही अनाहारक अवस्था आती है।
भाग ५: विविध और उपसंहार (८१-१००)
८१. आहारक जीव के पुद्गल परावर्तन का विचार कहाँ किया जाता है?
उत्तर: जीवकांड में।
८२. क्या सभी संसारी जीव आहारक हैं?
उत्तर: हाँ, अनाहारक काल बहुत अल्प है।
८३. आहारक मार्गणा में किस लेश्या का विचार होता है?
उत्तर: सभी ६ लेश्याओं का।
८४. क्या अनाहारक जीव के लेश्या होती है?
उत्तर: हाँ, कार्मण लेश्या।
८५. 'आहारक' शब्द का एक अन्य अर्थ जैन मुनियों के संदर्भ में क्या है?
उत्तर: आहारक ऋद्धि (६वें गुणस्थान में)।
८६. क्या आहारक ऋद्धि वाला पुतला आहार ग्रहण करता है?
उत्तर: वह ज्ञान के लिए गमन करता है, भोजन के लिए नहीं।
८७. आहारक मार्गणा का फल क्या है?
उत्तर: शरीर की प्राप्ति।
८८. क्या अनाहारक अवस्था में इन्द्रियां होती हैं?
उत्तर: नहीं, केवल शक्ति रूप में होती हैं।
८९. आहारक जीव के ज्ञान कितने हो सकते हैं?
उत्तर: १ से ४ ज्ञान तक।
९०. अनाहारक जीव के कौन से ज्ञान होते हैं?
उत्तर: मति, श्रुत और अवधि (विग्रह गति की अपेक्षा)।
९१. क्या आहारक जीव भव्य या अभव्य हो सकता है?
उत्तर: दोनों।
९२. अनाहारक अवस्था में क्या सम्यक्त्व रह सकता है?
उत्तर: हाँ।
९३. क्या अनाहारक जीव संयमी हो सकता है?
उत्तर: नहीं (केवल केवली समुद्घात की अपेक्षा संभव है)।
९४. गोम्मटसार में मार्गणाओं का क्रम क्या है?
उत्तर: गति, इंद्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, संज्ञी, आहार।
९५. आहार मार्गणा कौन से नंबर की मार्गणा है?
उत्तर: १४वीं (अंतिम)।
९६. आहारक जीव के कितने वेद हो सकते हैं?
उत्तर: तीनों वेद।
९७. क्या अनाहारक जीव के वेद होता है?
उत्तर: भाव वेद हो सकता है, द्रव्य वेद नहीं।
९८. आहार मार्गणा के ज्ञान से क्या लाभ है?
उत्तर: जीव की पराधीनता और शरीर के प्रति ममत्व का त्याग।
९९. क्या केवली के कवलाहार न मानने पर वे जीवित कैसे रहते हैं?
उत्तर: वे केवल नोकर्माहार (परमाणुओं के ग्रहण) से जीवित रहते हैं।
१००. आहार मार्गणा का अंतिम लक्ष्य क्या है?
उत्तर: अनाहारक (सिद्ध) पद की प्राप्ति करना।
आशा है कि जैन दर्शन के जीवकांड पर आधारित यह १०० प्रश्न आपकी जिज्ञासा को शांत करेंगे। क्या आप इनमें से किसी विशेष बिंदु पर और स्पष्टीकरण चाहते हैंहैं