[19/02, 9:19 pm] सुनीला भाभी(जबलपुर म.प्रदेश) उदयनगर इंदौर में रहते है।: निश्चित रूप से, आपकी जिज्ञासा को और गहराई देने के लिए यहाँ ज्ञानवर्धन और जैन दर्शन पर आधारित 20 महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके विस्तृत उत्तर दिए गए हैं। ये प्रश्न आपको ज्ञान मार्ग की सूक्ष्मताओं को समझने में मदद करेंगे।
जैन ज्ञान-दर्शन: 20 प्रश्नोत्तरी
प्रश्न 1: जैन धर्म में 'ज्ञान' की परिभाषा क्या है?
उत्तर: जो स्वयं को और दूसरों को (स्व-पर) प्रकाशित करे, उसे ज्ञान कहते हैं। ज्ञान आत्मा का वह गुण है जिसके बिना चेतना का अस्तित्व संभव नहीं है।
प्रश्न 2: ज्ञान और दर्शन (Vision) में क्या अंतर है?
उत्तर: किसी वस्तु को सामान्य रूप से देखना (General Perception) 'दर्शन' है, और उसे विस्तार से, गुणों सहित जानना (Specific Knowledge) 'ज्ञान' है।
प्रश्न 3: 'मति ज्ञान' के कितने भेद होते हैं?
उत्तर: मति ज्ञान के मुख्य रूप से 4 भेद हैं: अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा। विस्तार से इसके 336 भेद बताए गए हैं।
प्रश्न 4: 'श्रुत ज्ञान' (Scriptural Knowledge) किसे कहते हैं?
उत्तर: जो ज्ञान मति ज्ञान (इंद्रियों) के माध्यम से शब्दों, संकेतों या शास्त्रों को पढ़कर या सुनकर प्राप्त होता है, उसे श्रुत ज्ञान कहते हैं।
प्रश्न 5: 'अवधि ज्ञान' (Clairvoyance) क्या है?
उत्तर: वह प्रत्यक्ष ज्ञान जो बिना इंद्रियों और मन की सहायता के, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा के भीतर रूपी पदार्थों को जानता है।
प्रश्न 6: 'मन:पर्यय ज्ञान' किसे प्राप्त होता है?
उत्तर: यह उच्च श्रेणी का ज्ञान केवल उन दिगंबर मुनियों को प्राप्त होता है जिन्होंने कठिन तपस्या की हो। इससे वे दूसरों के मन के विचारों को जान लेते हैं।
प्रश्न 7: 'केवल ज्ञान' (Omniscience) की क्या विशेषता है?
उत्तर: यह पूर्ण, अनंत और निरावरण ज्ञान है। इसमें त्रिकाल (भूत, भविष्य, वर्तमान) और तीनों लोकों की समस्त पर्यायें एक साथ दर्पण की तरह झलकती हैं।
प्रश्न 8: सम्यक ज्ञान और मिथ्या ज्ञान में क्या फर्क है?
उत्तर: यदि ज्ञान के साथ सही दृष्टि (सम्यक दर्शन) है, तो वह 'सम्यक ज्ञान' है। यदि दृष्टि गलत है, तो वही ज्ञान 'कुज्ञान' या 'मिथ्या ज्ञान' कहलाता है।
प्रश्न 9: क्या ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु का होना अनिवार्य है?
उत्तर: हाँ, अधिकांशतः गुरु की आवश्यकता होती है (इसे 'परतः' ज्ञान कहते हैं), लेकिन कुछ महान आत्माओं को स्वयं के चिंतन से भी ज्ञान प्राप्त होता है (इसे 'स्वतः' ज्ञान कहते हैं)।
प्रश्न 10: 'स्याद्वाद' ज्ञानवर्धन में कैसे मदद करता है?
उत्तर: स्याद्वाद हमें सिखाता है कि सत्य को अलग-अलग अपेक्षाओं से देखें। इससे संकीर्णता दूर होती है और ज्ञान का दायरा बढ़ता है।
प्रश्न 11: ज्ञान प्राप्त करने की सर्वश्रेष्ठ मुद्रा कौन सी है?
उत्तर: ज्ञान के लिए 'विनय मुद्रा' सर्वश्रेष्ठ है। शांत चित्त और अहंकार शून्य होकर ही ज्ञान ग्रहण किया जा सकता है।
प्रश्न 12: 'ज्ञानावरणीय कर्म' का बंध कैसे होता है?
उत्तर: ज्ञान की निंदा करना, शास्त्रों को गंदे हाथों से छूना, ज्ञान को पैसे के लिए बेचना या योग्य पात्र को ज्ञान न देना—इनसे ज्ञान ढंकने वाले कर्म बंधते हैं।
प्रश्न 13: ज्ञान का अंतिम फल क्या है?
उत्तर: ज्ञान का अंतिम और वास्तविक फल 'वैराग्य' और 'मोक्ष' (दुखों से पूर्ण मुक्ति) है।
प्रश्न 14: क्या उपवास से ज्ञान बढ़ता है?
उत्तर: उपवास से इंद्रियां शांत होती हैं और मन की एकाग्रता बढ़ती है, जिससे आत्मा की शुद्धि होती है और ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्रश्न 15: 'स्वाध्याय' (Self-study) को सबसे बड़ा तप क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि स्वाध्याय से मोह का नाश होता है, चित्त स्थिर होता है और कर्मों की सबसे अधिक निर्जरा (सफाई) होती है।
प्रश्न 16: 'भेद-विज्ञान' का अभ्यास कैसे करें?
उत्तर: निरंतर यह चिंतन करें: "शरीर नश्वर है, जड़ है, दर्द शरीर को हो रहा है; मैं तो केवल उसे जान रहा हूँ, मैं अविनाशी चेतन हूँ।"
प्रश्न 17: ज्ञान की रक्षा कैसे की जाए?
उत्तर: ज्ञान की रक्षा 'अभ्यास' (निरंतर दोहराने) और उसे सुपात्रों को दान देने से होती है।
प्रश्न 18: सरस्वती देवी का जैन धर्म में क्या स्थान है?
उत्तर: जैन धर्म में सरस्वती को 'श्रुत देवी' या 'जिनवाणी' का प्रतीक माना जाता है, जो तीर्थंकरों की दिव्य ध्वनि का विस्तार करती हैं।
प्रश्न 19: 'प्रमाण' किसे कहते हैं?
उत्तर: वह ज्ञान जो वस्तु के स्वरूप का पूरी तरह, बिना किसी संशय के निर्णय करे, उसे 'प्रमाण' कहते हैं।
प्रश्न 20: ज्ञान मार्ग पर चलने वाले के लिए सबसे जरूरी गुण क्या है?
उत्तर: 'विवेक'। विवेक वह शक्ति है जो हमें यह बताती है कि क्या ग्रहण करने योग्य है और क्या छोड़ने योग्य।
ये 20 प्रश्न आपके ज्ञानवर्धन की नींव को मजबूत करेंगे। यदि आप इनमें से किसी एक प्रश्न (जैसे 'केवल ज्ञान' या 'स्याद्वाद') पर 5-10 पेज का विस्तृत लेख चाहते हैं, तो मुझे बताएं। मैं आपकी सहायता के लिए सदैव तत्पर हूँ।
क्या आप चाहते हैं कि मैं इन प्रश्नों को और अधिक दार्शनिक गहराई के साथ समझाऊं?
[19/02, 9:19 pm] सुनीला भाभी(जबलपुर म.प्रदेश) उदयनगर इंदौर में रहते है।: आपकी ज्ञान की प्यास वास्तव में सराहनीय है। जैन दर्शन में 'ज्ञान मार्गणा' (Gyan Margana) का अर्थ है—आत्मा को ज्ञान के गुणों के माध्यम से खोजना और पहचानना।
यहाँ ज्ञान मार्गणा, ज्ञान के सूक्ष्म भेदों और आत्म-बोध पर आधारित 20 और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर दिए गए हैं:
ज्ञान मार्गणा: 20 गहन प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 21: 'मार्गणा' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: मार्गणा का अर्थ है 'खोजना'। जिन अवस्थाओं या गुणों के माध्यम से जीव (आत्मा) की खोज की जाती है, उन्हें मार्गणा कहते हैं। ज्ञान उनमें से एक प्रमुख माध्यम है।
प्रश्न 22: क्या ज्ञान केवल मनुष्यों में ही होता है?
उत्तर: नहीं, जैन दर्शन के अनुसार संसार के प्रत्येक जीव (चींटी से लेकर हाथी तक) में ज्ञान होता है, क्योंकि ज्ञान आत्मा का अविनाशी गुण है। अंतर केवल उसकी 'शक्ति' और 'प्रकटीकरण' (Expression) का है।
प्रश्न 23: 'कुमति' और 'कुश्रुत' ज्ञान क्या हैं?
उत्तर: जब मति और श्रुत ज्ञान मिथ्या दर्शन (गलत धारणा) के साथ होते हैं, तो उन्हें 'कुमति' और 'कुश्रुत' कहते हैं। यह ज्ञान तो है, लेकिन मोक्ष मार्ग में बाधक है।
प्रश्न 24: 'अक्षर' और 'अनक्षर' श्रुत ज्ञान में क्या अंतर है?
उत्तर: जो ज्ञान शब्दों और अक्षरों के माध्यम से हो, वह 'अक्षर श्रुत' है। जो ज्ञान संकेतों, स्पर्श या गंध के माध्यम से अर्थ समझा दे, वह 'अनक्षर श्रुत' है।
प्रश्न 25: ज्ञान मार्गणा में 'उपयोग' का क्या महत्व है?
उत्तर: चेतना के व्यापार को 'उपयोग' कहते हैं। आत्मा जब जानने में लगी होती है, तो उसे 'ज्ञानोपयोग' कहते हैं। बिना उपयोग के ज्ञान कार्यकारी नहीं होता।
प्रश्न 26: क्या ज्ञान और आत्मा दो अलग चीजें हैं?
उत्तर: निश्चय नय (अध्यात्म) से ज्ञान और आत्मा एक ही हैं। जैसे मिश्री और उसकी मिठास अलग नहीं की जा सकती, वैसे ही आत्मा से ज्ञान को अलग नहीं किया जा सकता।
प्रश्न 27: 'परोक्ष' और 'प्रत्यक्ष' ज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर: जो ज्ञान इंद्रियों और मन की सहायता से हो, वह 'परोक्ष' (Indirect) है। जो ज्ञान सीधे आत्मा से हो (जैसे अवधि, केवल ज्ञान), वह 'प्रत्यक्ष' (Direct) है।
प्रश्न 28: ज्ञान की वृद्धि में 'एकाग्रता' का क्या स्थान है?
उत्तर: एकाग्रता वह लेंस है जो ज्ञान की बिखरी हुई किरणों को एक बिंदु पर केंद्रित कर अज्ञान के कचरे को जला देती है। इसके बिना गहरा बोध संभव नहीं है।
प्रश्न 29: 'श्रुत केवली' किसे कहा जाता है?
उत्तर: जिन्हें 'केवल ज्ञान' तो नहीं हुआ, लेकिन जो समस्त जैन आगमों (शास्त्रों) के पूर्ण ज्ञाता होते हैं, उन्हें 'श्रुत केवली' कहा जाता है।
प्रश्न 30: क्या बहुत अधिक सांसारिक पढ़ाई ज्ञान मार्ग में सहायक है?
उत्तर: यदि वह पढ़ाई अहंकार बढ़ाती है, तो वह बंधन है। यदि वह सत्य को समझने में विवेक प्रदान करती है, तो वह 'सम्यक ज्ञान' की सीढ़ी बन सकती है।
प्रश्न 31: 'ज्ञान का मद' (अहंकार) होने पर क्या हानि होती है?
उत्तर: ज्ञान का मद करने से व्यक्ति नीच गोत्र का बंध करता है और भविष्य में उसकी बुद्धि मंद हो जाती है। ज्ञानी हमेशा विनम्र होता है।
प्रश्न 32: 'अविपरीत' ज्ञान का क्या अर्थ है?
उत्तर: वस्तु जैसा स्वरूप रखती है, उसे ठीक वैसा ही जानना, बिना किसी मिलावट या कल्पना के—यही 'अविपरीत' या सच्चा ज्ञान है।
प्रश्न 33: ज्ञान मार्ग में 'तर्क' (Logic) की क्या सीमा है?
उत्तर: तर्क बुद्धि को साफ करता है, लेकिन अलौकिक सत्यों (जैसे स्वर्ग-नरक या परमाणु) को जानने के लिए 'आगम' (शास्त्र) और 'श्रद्धा' की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 34: क्या स्त्रियाँ केवल ज्ञान प्राप्त कर सकती हैं?
उत्तर: दिगंबर परंपरा के अनुसार, केवल ज्ञान के लिए दिगंबरत्व (मुनि अवस्था) अनिवार्य है जो उस शरीर में संभव नहीं, जबकि श्वेतांबर परंपरा मानती है कि स्त्रियाँ भी केवल ज्ञान प्राप्त कर सकती हैं।
प्रश्न 35: ज्ञान और 'भाव' (Intention) का क्या संबंध है?
उत्तर: यदि भाव शुद्ध नहीं हैं, तो महान शास्त्रों का ज्ञान भी फल नहीं देता। भावों की शुद्धि ही ज्ञान को 'सम्यक' बनाती है।
प्रश्न 36: 'नय' का ज्ञान क्यों जरूरी है?
उत्तर: क्योंकि दुनिया में झगड़े 'एकपक्षीय' सोच से होते हैं। नय का ज्ञान हमें 'अपेक्षा' समझना सिखाता है, जिससे विवाद समाप्त होते हैं और ज्ञान पूर्ण होता है।
प्रश्न 37: ज्ञान मार्ग में 'मौन' का क्या महत्व है?
उत्तर: मौन बाहर की ऊर्जा को बचाकर भीतर के ज्ञान को जगाने में मदद करता है। बड़े-बड़े सत्य मौन में ही अनुभव किए जाते हैं।
प्रश्न 38: 'द्रव्य श्रुत' और 'भाव श्रुत' क्या हैं?
उत्तर: लिखे हुए शास्त्र 'द्रव्य श्रुत' हैं, और उनसे जो आत्मा में बोध (Understanding) पैदा होता है, वह 'भाव श्रुत' है।
प्रश्न 39: क्या ज्ञान मार्ग 'भक्ति मार्ग' से अलग है?
उत्तर: नहीं, दोनों पूरक हैं। बिना ज्ञान के भक्ति 'अंधभक्ति' है, और बिना भक्ति (विनय) के ज्ञान 'शुष्क अहंकार' है।
प्रश्न 40: ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु कौन है?
उत्तर: 'मोह'। मोह हमारी बुद्धि पर पर्दा डाल देता है, जिससे हमें गलत चीज सही और सही चीज गलत लगने लगती है।
ये 40 प्रश्न (20 पहले के और 20 ये) आपको ज्ञान मार्गणा के विस्तृत सागर की एक झलक देते हैं।
क्या आप चाहते हैं कि मैं इन 40 प्रश्नों को एक व्यवस्थित 'ई-बुक' या 'लेख' के रूप में संकलित कर दूँ जिसे आप पढ़ सकें?
[19/02, 9:19 pm] सुनीला भाभी(जबलपुर म.प्रदेश) उदयनगर इंदौर में रहते है।: यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई कि आप 'जीवकांड' (Gommatasar Jivakand) के परिप्रेक्ष्य में ज्ञान मार्गणा को समझना चाहते हैं। आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती द्वारा रचित 'गोम्मटसार जीवकांड' जैन दर्शन का एक अत्यंत सूक्ष्म ग्रंथ है, जो आत्मा (जीव) के स्वरूप का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।
यहाँ जीवकांड के आधार पर ज्ञान मार्गणा से संबंधित 20 विशेष प्रश्न और उत्तर दिए गए हैं:
जीवकांड: ज्ञान मार्गणा (20 विशेष प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 41: जीवकांड के अनुसार 'ज्ञान मार्गणा' का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य जीव की अवस्थाओं को उसके 'जानने के स्वभाव' के आधार पर पहचानना है। जीवकांड में बताया गया है कि संसारी जीव किन-किन ज्ञान की अवस्थाओं से गुजरता है।
प्रश्न 42: जीवकांड में ज्ञान के कितने भेदों की चर्चा की गई है?
उत्तर: इसमें ज्ञान के 8 भेदों की चर्चा है: 3 कुज्ञान (कुमति, कुश्रुत, कुअवधि) और 5 सम्यक ज्ञान (मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय, केवल ज्ञान)।
प्रश्न 43: 'अभव्य जीव' में कौन-कौन से ज्ञान पाए जाते हैं?
उत्तर: अभव्य जीव (जो कभी मोक्ष नहीं जाएगा) में केवल 3 कुज्ञान (कुमति, कुश्रुत और कभी-कभी विभंग/कुअवधि) ही हो सकते हैं। वह सम्यक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।
प्रश्न 44: 'अक्षर ज्ञान' का सबसे छोटा अंश (भाग) किसे कहा गया है?
उत्तर: जीवकांड के अनुसार श्रुत ज्ञान का सबसे जघन्य (छोटा) अंश 'पर्याय अक्षर' है, जो एक निगोदिया जीव को भी होता है। इससे कम ज्ञान किसी जीव में नहीं हो सकता।
प्रश्न 45: 'मति ज्ञान' और 'श्रुत ज्ञान' का आपस में क्या संबंध है?
उत्तर: मति ज्ञान कारण है और श्रुत ज्ञान उसका कार्य। जीवकांड के अनुसार, बिना मति ज्ञान के श्रुत ज्ञान नहीं हो सकता। (जैसे धुएँ को देखना मति ज्ञान है, और उससे 'आग है' यह समझना श्रुत ज्ञान है)।
प्रश्न 46: 'विभंग ज्ञान' (Vibhanga Jnana) किसे कहते हैं?
उत्तर: मिथ्या दृष्टि जीव को जो 'अवधि ज्ञान' (बिना इंद्रियों के दूर का जानना) होता है, उसे विभंग ज्ञान या कु-अवधि ज्ञान कहते हैं।
प्रश्न 47: केवल ज्ञान होने पर मति, श्रुत आदि चार ज्ञानों का क्या होता है?
उत्तर: जैसे सूर्य के निकलने पर दीपक की रोशनी की जरूरत नहीं रहती, वैसे ही केवल ज्ञान होने पर बाकी चारों परोक्ष ज्ञान नष्ट हो जाते हैं। केवल ज्ञानी के केवल एक 'केवल ज्ञान' ही रहता है।
प्रश्न 48: जीवकांड के अनुसार 'मन:पर्यय ज्ञान' के दो भेद कौन से हैं?
उत्तर: 1. ऋजुमति: जो मन के सरल विचारों को जाने। 2. विपुलमति: जो मन के सूक्ष्म और जटिल विचारों को जाने।
प्रश्न 49: 'अवधि ज्ञान' के क्षेत्र की मर्यादा क्या है?
उत्तर: यह द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा के अधीन है। यह पूरे लोक (Universe) को जान सकता है, लेकिन 'अलोक' को नहीं।
प्रश्न 50: 'ज्ञान' और 'ज्ञेय' का क्या संबंध है?
उत्तर: 'ज्ञान' आत्मा है और 'ज्ञेय' वे वस्तुएं हैं जिन्हें जाना जाता है। जीवकांड कहता है कि ज्ञान ज्ञेय में नहीं जाता, बल्कि ज्ञेय ज्ञान में प्रतिबिंबित होते हैं।
प्रश्न 51: क्या एक जीव को एक साथ पाँचों ज्ञान हो सकते हैं?
उत्तर: नहीं। एक जीव को एक साथ अधिकतम चार ज्ञान (मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय) हो सकते हैं। केवल ज्ञान हमेशा अकेला ही होता है।
प्रश्न 52: संसारी जीव के ज्ञान पर सबसे अधिक प्रभाव किसका पड़ता है?
उत्तर: 'क्षयोपशम' का। कर्मों के कुछ अंश के उदय और कुछ के दबने से जो ज्ञान का उघाड़ होता है, उसे क्षयोपशम ज्ञान कहते हैं।
प्रश्न 53: 'श्रुत ज्ञान' के कितने अंग जीवकांड में बताए गए हैं?
उत्तर: श्रुत ज्ञान के मुख्य रूप से दो भेद हैं: अंग-प्रविष्ट (12 अंग जैसे आचारांग आदि) और अंग-बाह्य।
प्रश्न 54: निगोदिया जीव (सबसे सूक्ष्म जीव) में कौन सा ज्ञान होता है?
उत्तर: उनमें केवल 'मति ज्ञान' और 'श्रुत ज्ञान' का अत्यंत सूक्ष्म अंश (अक्षर का अनंतवां भाग) पाया जाता है।
प्रश्न 55: 'ज्ञान मार्गणा' में गुणस्थानों का क्या संबंध है?
उत्तर: पहले से तीसरे गुणस्थान तक कुज्ञान होते हैं। चौथे गुणस्थान से सम्यक ज्ञान शुरू होता है और 13वें गुणस्थान में 'केवल ज्ञान' प्रकट होता है।
प्रश्न 56: 'मति ज्ञान' के 336 भेद किन आधारों पर किए गए हैं?
उत्तर: ये भेद अवग्रह, ईहा, अवाय, धारणा के साथ 5 इंद्रियों, मन और विभिन्न पदार्थों के गुणा-भाग से बनते हैं।
प्रश्न 57: 'उपयोग' के 12 भेदों में ज्ञान के कितने भेद हैं?
उत्तर: उपयोग के 12 भेदों में से 8 भेद ज्ञानोपयोग के हैं (5 सम्यक ज्ञान + 3 कुज्ञान)।
प्रश्न 58: 'ज्ञान' आत्मा को कर्मों से कैसे बचाता है?
उत्तर: जब ज्ञान 'स्व' (आत्मा) की ओर मुड़ता है, तो नए कर्मों का आना रुक जाता है (संवर) और पुराने कर्म झड़ने लगते हैं (निर्जरा)।
प्रश्न 59: जीवकांड में 'लब्धि' और 'उपयोग' का क्या अंतर है?
उत्तर: ज्ञान की शक्ति का होना 'लब्धि' है, और उस शक्ति का वर्तमान में जानने में इस्तेमाल होना 'उपयोग' है।
प्रश्न 60: ज्ञान मार्गणा का सार क्या है?
उत्तर: इसका सार यह है कि जीव चाहे किसी भी योनि में हो, उसका 'जानना' कभी खत्म नहीं होता। साधक को चाहिए कि वह पर-पदार्थों को जानने के बजाय स्वयं को जानने का पुरुषार्थ करे।
ये 60 प्रश्न (कुल मिलाकर) अब आपके पास एक लघु-ग्रंथ की तरह हो गए हैं। जीवकांड का यह विषय अत्यंत गहरा है।
अगला कदम: क्या आप चाहेंगे कि मैं इन सभी 60 प्रश्नों को व्यवस्थित रूप से PDF जैसे फॉर्मेट में तैयार कर दूँ, या आप किसी विशेष 'ज्ञान' (जैसे केवल ज्ञान) की प्रक्रिया पर और अधिक विस्तार चाहते हैं?
[19/02, 9:19 pm] सुनीला भाभी(जबलपुर म.प्रदेश) उदयनगर इंदौर में रहते है।: आपकी इस अद्भुत ज्ञान-पिपासा को मेरा नमन। 'गोम्मटसार जीवकांड' जैसे महान ग्रंथ के आधार पर ज्ञान मार्गणा को समझना साक्षात सरस्वती की साधना जैसा है।
यहाँ ज्ञान मार्गणा और जीवकांड के गहरे सिद्धांतों पर आधारित अगले 20 प्रश्न और उत्तर (61 से 80) दिए गए हैं:
जीवकांड: ज्ञान मार्गणा (भाग-4: प्रश्न 61 से 80)
प्रश्न 61: 'मति ज्ञान' के अंतर्गत 'अवग्रह' किसे कहते हैं?
उत्तर: जब इंद्रिय और पदार्थ का संबंध होता है, तो सबसे पहले जो सामान्य बोध होता है कि "कुछ है", उसे अवग्रह कहते हैं। (जैसे अंधेरे में किसी चीज का स्पर्श होना)।
प्रश्न 62: 'ईहा' मतिज्ञान का अर्थ क्या है?
उत्तर: अवग्रह के बाद, उस पदार्थ के बारे में विशेष जानने की जो इच्छा या तर्क उठता है कि "यह क्या हो सकता है?", उसे ईहा कहते हैं।
प्रश्न 63: 'अवाय' ज्ञान क्या है?
उत्तर: ईहा के बाद जब जीव किसी निर्णय पर पहुँचता है कि "यह खंभा ही है, आदमी नहीं", तो उस निश्चित ज्ञान को अवाय कहते हैं।
प्रश्न 64: 'धारणा' ज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर: जब अवाय द्वारा जाना गया पदार्थ कालान्तर में भी न भूले और स्मृति में स्थिर हो जाए, तो उसे धारणा कहते हैं।
प्रश्न 65: 'श्रुत ज्ञान' के 'अंग-प्रविष्ट' और 'अंग-बाह्य' में क्या अंतर है?
उत्तर: तीर्थंकरों की वाणी को गणधरों ने जो 12 अंगों में गूँथा, वह अंग-प्रविष्ट है। अन्य आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथ (जैसे जीवकांड स्वयं) अंग-बाह्य कहलाते हैं।
प्रश्न 66: 'पर्याय' और 'पर्याय समास' श्रुत ज्ञान क्या है?
उत्तर: श्रुत ज्ञान के सबसे छोटे अंश को 'पर्याय' कहते हैं। जब यह ज्ञान थोड़ा बढ़ता है और अक्षरों का रूप लेता है, तो उसे 'पर्याय समास' कहते हैं।
प्रश्न 67: 'अवधि ज्ञान' के तीन मुख्य भेद कौन से हैं?
उत्तर: जीवकांड के अनुसार इसके तीन भेद हैं:
* देशावधि (सीमित क्षेत्र का ज्ञान),
* परमावधि (बहुत बड़े क्षेत्र का ज्ञान),
* सर्वावधि (संपूर्ण रूपी पदार्थों का ज्ञान)।
प्रश्न 68: 'भव प्रत्यय' अवधि ज्ञान किसे होता है?
उत्तर: जो ज्ञान किसी साधना से नहीं, बल्कि उस योनि में जन्म लेने मात्र से मिल जाता है। यह देवों और नारकियों को होता है।
प्रश्न 69: 'गुण प्रत्यय' अवधि ज्ञान क्या है?
उत्तर: जो ज्ञान संयम, तप और गुणों की वृद्धि से प्राप्त होता है। यह केवल मनुष्यों और तिर्यंचों को हो सकता है।
प्रश्न 70: 'ऋजुमति मन:पर्यय' ज्ञान की सीमा क्या है?
उत्तर: यह केवल सीधे और सरल विचारों को जान पाता है जो वर्तमान में मन में चल रहे हों। यह ज्ञान छूट भी सकता है।
प्रश्न 71: 'विपुलमति मन:पर्यय' ज्ञान की क्या विशेषता है?
उत्तर: यह अत्यंत सूक्ष्म विचारों को जानता है और एक बार प्राप्त होने के बाद केवल ज्ञान होने तक बना रहता है (यह कभी नष्ट नहीं होता)।
प्रश्न 72: 'ज्ञान' और 'दर्शन' के उपयोग में क्या अंतर है?
उत्तर: ज्ञान साकार (Detailed) होता है और दर्शन निराकार (General) होता है। दर्शन पहले होता है, ज्ञान उसके बाद।
प्रश्न 73: केवल ज्ञानी को 'दर्शन' और 'ज्ञान' एक साथ क्यों होते हैं?
उत्तर: संसारी जीवों के आवरण कर्म अलग-अलग समय पर हटते हैं, इसलिए उन्हें क्रम से ज्ञान होता है। केवल ज्ञानी के मोह और अज्ञान पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं, इसलिए उन्हें दोनों एक साथ (युगपत्) होते हैं।
प्रश्न 74: 'श्रुत ज्ञान' को 'परोक्ष' क्यों माना गया है?
उत्तर: क्योंकि यह स्वयं आत्मा से नहीं, बल्कि शब्दों, संकेतों या मति ज्ञान के माध्यम से 'दूसरे' (परोक्ष) साधन पर निर्भर होता है।
प्रश्न 75: जीवकांड के अनुसार 'नय' ज्ञान का फल क्या है?
उत्तर: नय ज्ञान का फल 'एकांत' का नाश है। यह जीव को हठधर्मी होने से बचाता है और सत्य के बहुआयामी स्वरूप को दिखाता है।
प्रश्न 76: 'ज्ञान मार्गणा' में 'लब्धि' के पांच भेद कौन से हैं?
उत्तर: क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य और करण लब्धि। ये पांचों ज्ञान की शक्ति प्रकट करने के सोपान हैं।
प्रश्न 77: क्या नारकी जीवों को सम्यक ज्ञान हो सकता है?
उत्तर: हाँ, पहले नरक से सातवें नरक तक के जीव भी सम्यक दर्शन प्राप्त कर 'सम्यक मति-श्रुत-अवधि' ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न 78: 'ज्ञान' की पूर्णता किस गुणस्थान में होती है?
उत्तर: 13वें गुणस्थान (सयोग केवली) में पहुँचते ही ज्ञान पूर्ण (केवल ज्ञान) हो जाता है।
प्रश्न 79: 'अज्ञान' का क्या अर्थ है?
उत्तर: जैन दर्शन में अज्ञान का अर्थ 'ज्ञान का अभाव' नहीं है, बल्कि 'विपरीत ज्ञान' है। जैसे रस्सी को सांप समझना अज्ञान है।
प्रश्न 80: ज्ञान मार्गणा का अंतिम संदेश क्या है?
उत्तर: सब कुछ जानने के बाद भी यदि जीव ने अपनी 'आत्मा' को नहीं जाना, तो उसका सारा ज्ञान 'शून्य' के समान है। आत्म-ज्ञान ही सर्वोपरि ज्ञान है।
अब आपके पास 80 प्रश्नों का एक महा-संग्रह तैयार हो गया है। यह अपने आप में 'ज्ञान मार्गणा' पर एक छोटी पुस्तक के समान है।
क्या आप इस श्रृंखला को '100 प्रश्नों' तक पहुँचाकर इसे पूर्ण करना चाहेंगे? यदि हाँ, तो मैं अंतिम 20 प्रश्न भी प्रस्तुत कर सकता हूँ।
[19/02, 9:19 pm] सुनीला भाभी(जबलपुर म.प्रदेश) उदयनगर इंदौर में रहते है।: यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई कि आप इस श्रृंखला को पूर्ण करना चाहते हैं। 'ज्ञान मार्गणा' और 'जीवकांड' के इस गहन सफर में, यहाँ अंतिम 20 प्रश्न (81 से 100) प्रस्तुत हैं। इसके साथ ही आपके पास 100 प्रश्नों का एक संपूर्ण 'ज्ञान कोश' तैयार हो जाएगा।
जीवकांड: ज्ञान मार्गणा (अंतिम भाग: प्रश्न 81 से 100)
प्रश्न 81: 'श्रुत ज्ञान' को 'मति पूर्वक' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि जब तक इंद्रियां और मन (मति ज्ञान) किसी वस्तु को ग्रहण नहीं करते, तब तक उस पर गहराई से सोचना या शास्त्र का अर्थ निकालना (श्रुत ज्ञान) संभव नहीं है। मति 'बीज' है और श्रुत 'वृक्ष'।
प्रश्न 82: 'अंग-बाह्य' श्रुत ज्ञान के कितने भेद हैं?
उत्तर: इसके मुख्य रूप से 14 भेद हैं, जिन्हें 'प्रकीर्णक' कहा जाता है (जैसे सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, आदि)। ये मुनियों के आचरण और ज्ञान को पुष्ट करते हैं।
प्रश्न 83: 'अवधि ज्ञान' और 'केवल ज्ञान' में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: अवधि ज्ञान केवल 'रूपी' (पुद्गल/Matter) पदार्थों को जानता है, जबकि केवल ज्ञान 'रूपी' और 'अरूपी' (आत्मा, आकाश, धर्म, अधर्म द्रव्य) सभी को जानता है।
प्रश्न 84: 'कु-अवधि' या 'विभंग ज्ञान' का बुरा फल क्या है?
उत्तर: यह ज्ञान मिथ्या दृष्टि के कारण होता है। इससे जीव कभी-कभी अपने पिछले जन्म के बैर को देख लेता है और क्रोध में आकर नरक का बंध कर लेता है।
प्रश्न 85: क्या देवों को 'मन:पर्यय ज्ञान' हो सकता है?
उत्तर: नहीं। जीवकांड के अनुसार 'मन:पर्यय ज्ञान' और 'केवल ज्ञान' केवल मनुष्य गति में ही प्राप्त हो सकते हैं।
प्रश्न 86: 'ज्ञान' के उघाड़ (Clarity) का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: 'क्षयोपशम'। जब ज्ञानावरणीय कर्म की शक्तियां कम होती हैं और आत्मा की विशुद्धि बढ़ती है, तो ज्ञान का उघाड़ होता है।
प्रश्न 87: 'मति ज्ञान' को 'अननिंद्रिय' ज्ञान क्यों कहते हैं?
उत्तर: क्योंकि मति ज्ञान केवल 5 इंद्रियों से नहीं, बल्कि 'मन' से भी होता है। मन को जैन दर्शन में 'अनिंद्रिय' कहा गया है।
प्रश्न 88: 'श्रुत ज्ञान' के कितने अक्षर (Letters) बताए गए हैं?
उत्तर: जैन गणित के अनुसार, संपूर्ण श्रुत ज्ञान के अक्षरों की संख्या (2^64 - 1) के करीब बताई गई है। यह ब्रह्मांड के रहस्यों की विशालता को दर्शाता है।
प्रश्न 89: 'केवल ज्ञान' प्राप्त होने के बाद क्या जीव दोबारा अज्ञानी बन सकता है?
उत्तर: नहीं। केवल ज्ञान 'क्षायिक' ज्ञान है। एक बार प्रकट होने के बाद यह कभी नष्ट नहीं होता और न ही कभी ढकता है।
प्रश्न 90: जीवकांड में 'ज्ञान' को 'शस्त्र' क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि सम्यक ज्ञान वह शस्त्र है जो मोह और अज्ञान रूपी शत्रुओं को काट देता है और आत्मा को स्वतंत्र करता है।
प्रश्न 91: 'संशय' और 'विपर्पय' ज्ञान में क्या अंतर है?
उत्तर: "यह खंभा है या आदमी?"—यह संशय (Doubt) है। खंभे को 'आदमी' ही मान लेना—यह विपर्यय (Opposite knowledge) है।
प्रश्न 92: 'अनध्यवसाय' ज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर: चलते हुए घास का स्पर्श तो हुआ, पर "यह क्या था" उस पर ध्यान न देना—इसे अनध्यवसाय (Indistinct knowledge) कहते हैं। यह सम्यक ज्ञान नहीं है।
प्रश्न 93: 'निक्षेप' ज्ञान मार्गणा में कैसे सहायक है?
उत्तर: नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव—इन 4 निक्षेपों से किसी वस्तु को समझने पर ज्ञान में स्पष्टता आती है और भ्रम दूर होता है।
प्रश्न 94: क्या सिद्ध भगवान में 'ज्ञान मार्गणा' पाई जाती है?
उत्तर: नहीं। सिद्ध भगवान 'मार्गणातीत' (मार्गणाओं से परे) होते हैं। मार्गणा केवल संसारी जीवों की खोज के लिए होती है। सिद्धों में तो केवल एक शुद्ध 'अनंत ज्ञान' होता है।
प्रश्न 95: ज्ञान के साथ 'चरित्र' का क्या अनुपात होना चाहिए?
उत्तर: ज्ञान 'आँख' है और चरित्र 'पैर'। बिना आँख के पैर गड्ढे में गिरा देंगे और बिना पैर के आँख मंजिल तक नहीं पहुँचाएगी। दोनों का संतुलन अनिवार्य है।
प्रश्न 96: 'परम-अवधि' ज्ञान की क्या विशेषता है?
उत्तर: यह ज्ञान जिसे होता है, वह जीव उसी जन्म से नियम से मोक्ष जाता है। यह अत्यंत विशुद्ध आत्मा को ही प्रकट होता है।
प्रश्न 97: 'आगम' किसे कहते हैं?
उत्तर: आप्त (वीतरागी सर्वज्ञ देव) के वचनों को आगम कहते हैं। यह ज्ञान का वह प्रामाणिक स्रोत है जो इंद्रियों से परे की बातें बताता है।
प्रश्न 98: 'ज्ञान' का प्रकाश शरीर में कहाँ रहता है?
उत्तर: ज्ञान आत्मा का गुण है, इसलिए वह पूरे शरीर के बराबर आत्म-प्रदेशों में फैला रहता है। मुख्य रूप से इसका उपयोग मस्तिष्क और हृदय के माध्यम से अनुभूत होता है।
प्रश्न 99: 'सम्यक ज्ञान' की महिमा क्या है?
उत्तर: करोड़ों वर्षों तक किए गए अज्ञानी के तप से जितनी कर्म-निर्जरा नहीं होती, उतनी निर्जरा सम्यक ज्ञानी के एक क्षण के आत्म-चिंतन से हो जाती है।
प्रश्न 100: ज्ञान मार्गणा का पूर्ण फल क्या है?
उत्तर: अज्ञान का सर्वथा विनाश और स्वयं को 'परमात्मा' रूप में अनुभव करना ही ज्ञान मार्गणा का पूर्ण और अंतिम फल है।
निष्कर्ष
बधाई हो! आपने 100 प्रश्नों के माध्यम से 'ज्ञान मार्गणा' और 'जीवकांड' के गहरे सिद्धांतों का संक्षिप्त अध्ययन पूर्ण कर लिया है। यह संकलन अब आपके लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ (Reference) का काम कर सकता है।
आपके लिए अगला कदम:
क्या आप चाहेंगे कि मैं इन सभी 100 प्रश्नों को एक व्यवस्थित सारांश (Summary) के रूप में बदल दूँ, या आप जैन धर्म के किसी अन्य विषय (जैसे कर्म सिद्धांत या ध्यान) पर चर्चा करना चाहेंगे?
[19/02, 9:19 pm] सुनीला भाभी(जबलपुर म.प्रदेश) उदयनगर इंदौर में रहते है।: आपकी इस अद्भुत जिज्ञासा को देखकर ऐसा लगता है कि आप ज्ञान मार्गणा (Gyan Margana) के गूढ़ रहस्यों को पूरी तरह आत्मसात करना चाहते हैं। चूँकि हमने 100 प्रश्न पूर्ण कर लिए हैं, अब मैं आपको 20 और अत्यंत सूक्ष्म और तकनीकी प्रश्न (101 से 120) दे रहा हूँ, जो 'गोम्मटसार जीवकांड' और 'धवला' जैसे उच्च ग्रंथों के सार पर आधारित हैं।
ज्ञान मार्गणा: सूक्ष्म विश्लेषण (प्रश्न 101 से 120)
प्रश्न 101: 'अन्तर' और 'अल्पाबहुत्व' की दृष्टि से सबसे कम और सबसे अधिक ज्ञान किसमें है?
उत्तर: सबसे कम ज्ञान 'पर्याय अक्षर' (निगोद जीव) में है और सबसे अधिक 'केवल ज्ञान' है। संसारी जीवों में श्रुत ज्ञान के भेदों के आधार पर ज्ञान की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है।
प्रश्न 102: क्या 'ज्ञान' कभी पूरी तरह नष्ट हो सकता है?
उत्तर: नहीं। ज्ञान आत्मा का मूल स्वभाव है। यदि ज्ञान पूरी तरह नष्ट हो जाए, तो आत्मा 'अजीव' (जड़) बन जाएगी। बादलों के होने पर भी सूर्य का कुछ प्रकाश जैसे बना रहता है, वैसे ही घोर अज्ञान में भी अक्षर का अनंतवां भाग ज्ञान बना रहता है।
प्रश्न 103: 'मति ज्ञान' के 'अवाय' और 'धारणा' के बीच का सूक्ष्म अंतर क्या है?
उत्तर: 'अवाय' वर्तमान का निर्णय है (जैसे- यह वही व्यक्ति है), जबकि 'धारणा' भविष्य के लिए उसे स्मृति में सुरक्षित रखना है ताकि समय आने पर याद आ सके।
प्रश्न 104: 'श्रुत ज्ञान' को 'प्रमाण' कब माना जाता है?
उत्तर: जब वह वीतरागी सर्वज्ञ देव की वाणी (आगम) के अनुकूल हो और संशय, विपर्यय तथा अनध्यवसाय से रहित हो।
प्रश्न 105: 'क्षायोपशमिक ज्ञान' की सीमा क्या है?
उत्तर: मति, श्रुत, अवधि और मन:पर्यय ये चारों क्षायोपशमिक हैं। इनकी सीमा यह है कि ये एक समय में एक ही ज्ञेय (Object) को मुख्य रूप से जान सकते हैं।
प्रश्न 106: 'केवल ज्ञान' में 'अनंत' शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: यहाँ अनंत का अर्थ है कि वह ज्ञान उन सभी पदार्थों को जान लेता है जो संख्या में अनंत हैं और जिनकी अवस्थाएं (पर्यायें) भी अनंत हैं।
प्रश्न 107: 'अवधि ज्ञान' के 'अनुगामी' और 'अननुगामी' भेद क्या हैं?
उत्तर: जो ज्ञान एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में साथ जाए वह 'अनुगामी' है, और जो उसी स्थान पर नष्ट हो जाए वह 'अननुगामी' है।
प्रश्न 108: क्या बिना 'मन' के भी ज्ञान हो सकता है?
उत्तर: हाँ, 'असैनी' (बिना मन वाले) जीवों को भी स्पर्श, रस, गंध आदि का मति और श्रुत ज्ञान होता है। इसे 'अमनस्क' ज्ञान कहते हैं।
प्रश्न 109: 'ज्ञान' और 'शक्ति' में क्या संबंध है?
उत्तर: ज्ञान स्वयं में एक शक्ति है। जितना अधिक ज्ञान निर्मल होता है, आत्मा की वीर्य (शक्ति) उतनी ही अधिक प्रकट होती है।
प्रश्न 110: 'उपयोग' के व्यापार में 'मन' का क्या रोल है?
उत्तर: मन एक 'ट्रैफिक पुलिस' की तरह है जो इंद्रियों से आने वाली सूचनाओं को व्यवस्थित करता है और आत्मा को निर्णय लेने में मदद करता है।
प्रश्न 111: 'प्रतिपाती' और 'अप्रतिपाती' ज्ञान क्या है?
उत्तर: जो ज्ञान प्राप्त होकर छूट जाए (जैसे विभंग या देशावधि) वह 'प्रतिपाती' है। जो मोक्ष तक बना रहे वह 'अप्रतिपाती' है।
प्रश्न 112: 'श्रुत ज्ञान' के 'अंग-बाह्य' प्रकीर्णकों की रचना किसने की?
उत्तर: इनकी रचना आचार्यों (जैसे श्रुतकेवली या अन्य महान आचार्य) ने मंद बुद्धि शिष्यों के कल्याण के लिए की है।
प्रश्न 113: 'मति ज्ञान' में 'अवग्रह' के कितने भेद होते हैं?
उत्तर: इसके दो मुख्य भेद हैं: अर्थावग्रह (पदार्थ का स्पष्ट बोध) और व्यंजनावग्रह (पदार्थ का अस्पष्ट या केवल संपर्क मात्र बोध)।
प्रश्न 114: 'व्यंजनावग्रह' किन इंद्रियों से नहीं होता?
उत्तर: यह नेत्र (आँख) और मन से नहीं होता, क्योंकि ये दोनों पदार्थ को बिना छुए (अप्राप्यकारी) जानते हैं।
प्रश्न 115: ज्ञान मार्गणा में 'मद' (Pride) के 8 प्रकारों में ज्ञान का मद क्यों वर्जित है?
उत्तर: क्योंकि ज्ञान का अहंकार करने से 'ज्ञानावरणीय कर्म' का तीव्र बंध होता है, जिससे जीव अगले जन्म में जड़-बुद्धि या गूंगा हो सकता है।
प्रश्न 116: 'भाव श्रुत' और 'अनुभव' में क्या समानता है?
उत्तर: भाव श्रुत ही वास्तव में अनुभव है। जब शास्त्र की बात आत्मा की अनुभूति बन जाए, तब वह भाव श्रुत कहलाता है।
प्रश्न 117: केवल ज्ञानी 'अतीन्द्रिय' कैसे हैं?
उत्तर: क्योंकि उनका ज्ञान शरीर की आँखों या मस्तिष्क पर निर्भर नहीं है। वे लोक के अंत में बैठे हुए भी ब्रह्मांड के हर कोने को सीधे देख लेते हैं।
प्रश्न 118: ज्ञान मार्गणा के अनुसार 'शिक्षा' और 'संस्कार' में क्या अंतर है?
उत्तर: शिक्षा मति-श्रुत ज्ञान को बढ़ाती है, जबकि संस्कार ज्ञान को 'सम्यक' (सही दिशा) प्रदान करते हैं।
प्रश्न 119: 'सम्यक ज्ञान' की ज्योति कब जलती है?
उत्तर: जब अनादि काल का 'मिथ्यात्व' (गलत श्रद्धा) टूटता है, तब ज्ञान की दीपक अपने आप सम्यक प्रकाश देने लगता है।
प्रश्न 120: क्या ज्ञान मार्गणा के बिना मोक्ष संभव है?
उत्तर: असंभव। बिना जाने (ज्ञान) कि बंधन क्या है और मुक्ति क्या है, कोई भी जीव मोक्ष मार्ग पर एक कदम भी नहीं बढ़ा सकता।
अब आगे क्या?
अब आपके पास 120 प्रश्नों का एक बहुत बड़ा संग्रह हो गया है। यह किसी भी जैन दर्शन के विद्यार्थी के लिए एक अनमोल निधि है।
क्या आप चाहते हैं कि मैं इन 120 प्रश्नों का एक 'विषय-वार' (Topic-wise) वर्गीकरण कर दूँ ताकि आप इन्हें आसानी से याद रख सकें? (जैसे- मति ज्ञान के प्रश्न अलग, केवल ज्ञान के अलग)। या फिर आप किसी नए मार्गणा (जैसे दर्शन मार्गणा या संयम मार्गणा) की ओर बढ़ना चाहते हैं?