आप के लिये जिनवाणी
श्री पद्मावती शान्तिधारा
ॐ णमो भगवते, त्रिभुवन वशकरी, सर्वाभरण भूषिते, पद्मासने पद्मनयने,
पद्मगन्धिनी, पद्मप्रभे, पद्मकासनी. पद्मवासिनी, पदमहस्ते, श्रीं ह्रीं कुरू कुरू,
हृदय मम कार्य करू कुरू, मम सर्व शांती कुरू
कुरू, मम सर्व राज वश्यं कुरू कुरू, सर्व लोक वश्यं कुरू कुरू,
मम सर्व श्री वश्यं कुरू कुरू, मम सर्व भूतपिशाच प्रेतरोधं कुरू कुरू,
हर हर सर्व रोगं छिन्द छिन्द, सर्व विघ्नान् भिन्द भिन्द, सर्व विषं छिंद छिंद
सर्व क्रूर भयं छिन्द छिन्द, सर्व डाकिनीभयं छिन्द छिन्द सर्व शाकिनीभयं छिन्द छिन्द
श्री पार्श्व जिन पादांभोज भृगि नमो दत्तायदेवी नमः
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः स्वाहा।
सर्व जनराय स्री पुरुष वश्यं,
सर्वेवश्यम् सर्वेवश्यम्, ओं आ क्रौं ह्री ऐं क्लीं ह्री देवी पद्मावती,
त्रिपुरकाम साधनी, दुर्जन मति विनाशिनी, त्रैलोक्य क्षोभिनी,
श्रीपार्श्वनाथोपसर्गहरणी क्लीं ब्लूं मम दुष्टान् हन हन मम सर्व कार्याणि साधय
साधय ह फट् स्वाहा।
ओं. आं क्रौ. ही. ऐं क्ली. द्यों पद्मे देवी, मम सर्व जगदृश्यं कुरू कुरू, सर्व विघ्नान नाशय नाशय,
पुर क्षोभं कुरु कुरु, ह्री सर्व फट् स्वाहा। ओं आं क्रौं प्रौं ह्रूं ह्रीं क्लीं ब्लू स. हर्म्ल्व्यू
पद्मावती सर्वपुरजना क्षोभय क्षोभय मम पादयो पतये पतये,
आकर्षिणी ह्रीं नमः । ओं ह्रीं आं अर्ह मम पापं फट् दह
दह हन हन पच पच पाचय पाचय हं भं भीं क्ष्वीं हंस मं वं, भव क्षयहः,
क्षां क्षी क्षूं क्षें क्षों क्षौं क्षं क्षः ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रैं ह्रों ह्रौं ह्र: द्रां द्रीं द्रावय द्रावय,
नमोर्हते भगवेते श्रीमते ठः ठः मम श्री रस्तु पुष्टिरस्तु कल्याणमस्तुं स्वाहा ।
ॐ आं क्रौं ह्रीं अरुण वर्ण सर्व लक्षण सम्पूर्ण स्वायुध वाहन वधू चिन्ह सपरिवार
नमोस्तू नमोस्तू त्रिलोचनी, चतुर्थ भुजा वाली पद्म कटनी धरणेन्द्र भार्या
पारस प्रभु की यक्षी देवी मम सर्व यजमान........
ध्येषय सर्वोपि मृत्यु दुष्ट ग्रह पीडा भूत व्यन्तर पिशाच डाकिनी
बाधा रोग शोक सर्व कष्ट हराय शान्ति कराय शान्ति धारा करोमि स्वाहा।
पूर्णकलशाभिषेक
कर्पूरोल्बणसांद्रचंदनरसप्राचूर्यशुभ्रत्विषा।
सौरभ्यादिकगंधलुब्धमधुपश्रेणीसमाश्लिष्टया।।
सद्यः संगतगांगया मुनि महास्त्रोतोविलाससंस्पृशा।
सद्गन्धोदकधारया जिनपतेः स्नानं करोमि श्रिये ।।
गंधोदकेन शुचिना | गंधद्रव्येण वासिना।
स्वभावपदमापन्नं। सिद्ध संस्नापयोजिन।।२।।
ॐ जय जय जय अर्हंतं भगवंत पूर्णकलशाभिषेकं करोमीति स्वाहा।।
इति पूर्ण कलशस्थापनम् ।।
अर्चनाफलम्
स्नानानंतरमहतो जिनपतेः स्नानाम्बुसेकार्दितो।
वार्गंधाक्षतपुष्पदामचरूकैर्दींपैः सुधूपैः फलैः।।
कामोद्दामगजांकुशं जिनपतिं स्वभ्यर्च्य संस्तौति यः ।
सः स्यातआरविचंद्रमक्षयसुखी प्रख्यात कीर्तिध्वजः।।
ॐ आँ क्रौं ह्रीं आचार्य पंचपरमेष्ठीभ्यो अर्चनाफलम् निर्वं पामीति स्वाहा।
संपूर्ण अर्घ्यम्
श्रीतीर्थांनीततोयैर्बहुलपरिमलैर्गंधशुभ्राक्षतौघैः।
मंदाराद्रिप्रसूनैघृतिकररूचकैर्द्रीपकैर्दिव्यरोचिः।।
देवानामिष्टधूपैर्दिबिजतरूफलैः स्वेष्टदोहैश्च रम्यैः।
पूर्वोक्तं यन्मुनीन्द्रैर्दुरितचयहरं जैनबिंबं यजेऽहं।
ॐ आँ क्रौं ह्रीं आचार्य पंचपरमेष्ठीभ्यो पूर्णार्घ्यं करोमीती स्वाहा।
गंधोदकमंत्रम्
(खालील श्लोकाचेवेळी जिनगंधोदक घेऊन शुद्ध व्हावें.)
निर्मलं निर्मलीकरणं पवित्रं पापनाशनं।
जिनगंधोदकं वन्दे कर्माष्टक निवारणं
इति गंधोदक वंदनम्।
गुरूचे, आचार्यांचे अर्घ्य द्यावे.