आप के लिये जिनवाणी
अरिहंतपरमेष्ठी के ४६ मूलगुण अतिशय-
तीर्थंकर केवली के अतिरिक्त जन्म के दस अतिशय अन्य केवली के नही होते ,कुछ और अतिशय भी भी कम होते है !
१० जन्म से,१० केवलज्ञान के बाद,१४ देवकृत,८ प्रतिहारी और ४ अनंत चतुष्टय होते है इनमे से १० जन्म से मूल गुण केवल तीर्थंकर परमेष्ठी के होते है अन्य अरिहंत भगवान् के नहीं होते !
(1). तीर्थंकर अरिहंत भगवान् के जन्म के अतिशय १०:-
तीर्थंकर भगवान के अतिशय
10 अतिशय - जन्म से ही होते हैं
10 अतिशय - केवलज्ञान होने पर स्वयं होते हैं, और
14 अतिशय - देवों के द्वारा होते हैं.
जन्म के 10 अतिशय
अतिशय रूप सुगंध तन , नाहि पसेव निहार !
प्रिय हित वचन अतुल्य बल , रुधिर श्वेत आकार !!
लक्षण सह्सरू आठ तन , समचतुषक संठान !
वज्रऋषभनाराचजुत, ये जनमत दस जान !!
1- अत्यंत ही सुंदर शरीर - जिनेन्द्र देव के शरीर की प्रशंसा व स्तुति इन्द्रादि भी अपनी सहस्त्र मुखों से करते समय असमर्थ हो गए, तो फिर हम और आप तो हैं ही क्या ?
2 - सुगंध तन - उनके शरीर की सुगंध भर से ही रोगियों के रोगों का नाश हो जाता है.
3 - अस्वेद - भगवान् को पसीना नहीं आता है !
4 - मल-मूत्र रहित - भगवान् की पाचन शक्ति ऐसी होती है की उन्हें जीवन भर मल-मूत्र नहीं होता है.
5 - हित-मित वचन - हित मतलब सभी जीवों के लिए हितकारी और मित का मतलब संदेह उत्त्पन्न न करने वाले वचन !
6 - अतुल्य बल - उनके शरीर के पराक्रम के सामान किसी अन्य का पराक्रम/बल नहीं है.
7 - रुधिर श्वेत - भगवान् का रक्त दूध के समान सफ़ेद होता है.
8 - लक्षण सह्सरू आठ तन - जिनेन्द्र देव के शरीर पर 1008 शुभ लक्षण/चिन्ह होते हैं. ये जन्म से ही होते हैं.
जैसे :- श्री वृक्ष , शंख , कमल , स्वस्तिक , शक्ति , चक्र ... इत्यादि ऐसे १००८ शुभ चिन्ह होते हैं !!!
9 - समचतुरस्त्र संठान - माने उनके शरीर ऊंचे, नीचे और मध्य में समान भाग से यथायोग्य आकृति वाला है.
10 - वज्रऋषभनाराच संहनन - माने उनके शरीर की हद्दियां, हड्डियों के जोड़, जोड़ों की कील वज्र के समान मज़बूत होती हैं.
केवलज्ञान के समय के 10 अतिशय
1- योजन सत-इक में सुभिख :- माने, केवली तीर्थंकरों के चारों और 100 योजन अर्थात 400 योजन तक सुभिक्ष (सुकाल) होता है, अकाल नहीं होता.
2- गगन-गमन :- जिनेन्द्र भगवान् का केवल-ज्ञान होने के बाद पृथ्वी पर गमन नहीं होता ! वह धरती से ऊपर चलते हैं. षट-काय के जीवों की बाधा रहित आकाश में ही आवागमन होता है.
3- मुख चार :- मुख तो 1 ही है, किन्तु जिनेन्द्र भगवान् के अतिशय से 4 मुख दिखाए पड़ते हैं. कारण ये है की देव, मनुष्य और त्रियंच चारों ही तरफ से भगवान् के दर्शन करते हैं.
4- उदया का अभाव :- माने जहाँ भगवान् विराजते हैं, वहाँ उनके शरीर से किसी भी सूक्ष्म स्थूल जीव का घात नहीं होता है. और साथ ही उस क्षेत्र में समस्त जीवों के भी दया भाव हो जाते हैं.
5- उपसर्ग नहीं :- जहाँ पर केवली भगवान् का समवशरण तिष्ठता है, वहाँ पर किसी भी प्रकार का उपसर्ग या उपद्रव नहीं होता है.
6- नाही कवलाहार :- केवलज्ञान हो जाने पर उनको भूख नहीं लगती है, न वे भोजन करते हैं, अनंत बल के कारण उनका शरीर बलशाली और ऊर्जावान बना रहता है.
7- सब विद्या-इश्वरपनो :- केवलज्ञान हो जाने के कारण उनको समस्त प्रकार का पूर्ण ज्ञान हो जाता है, कोई भी विद्या ज्ञान उनके लिए अपरिचित नहीं रह जाता.
8- नाहि बढें नख केश :- भगवान् के नाखून और बाल भी नहीं बढ़ते.
9- अनिमिष-द्रग :- भगवान् के नेत्र हर समय खुले रहते हैं - वे अपनी पलकें नहीं झपकते.
10- छाया-रहित :- उनके शरीर की परछाई भी नहीं पड़ती है.
देवों के द्वारा होने वाले 14 अतिशय
देव-रचित हैं चार दश, अर्द्ध-मागधी भाष !
आपस मांही मित्रता, निर्मल दिश आकाश !!
होत फूल फल ऋतु सबें , पृथ्वी कांच समान !
चरण कमल ताल कमल हैं, नभ ते जय जय वान !!
मंद सुगंध बयार पुनि, गंधोदक की वृष्टि !
भूमि विषै कंटक नहीं, हर्षमयी सब स्रष्टि !!
धर्मचक्र आगे रहे, पुनि वसु मंगल सार !
अतिशय श्री अरहंत के, ये चौंतीस प्रकार !!
1- अर्द्ध-मागधी भाषा :- माने, भगवान् की भाषा को मगध देव सर्व जीवों की भाषा मय कर देते हैं. वहाँ जो जीव सुन रहा होगा, उसे उसकी ही भाषा में सुनाई पड़ेगा. और, अर्ध-मागधी भाषा का, प्रत्येक शब्द 1 योजन अर्थात 4 कोस तक सुनाई देता है.
2- आपस मांही मित्रता :- सारे जीवों में आपस में मित्रता का भाव हो जाता है. हिरण-शेर, सांप-नेवला जैसे बैरी जीव भी मैत्री-भाव को धार कर, भगवान् के निकट एकत्र हो बैठते हैं.
3- निर्मल दिश :- सभी दिशाएं, जहाँ केवल ज्ञान युक्त भगवान् तिष्ठते हैं, वहाँ धूल भरी आंधी और मेघों के द्वारा बारिश नहीं होती है, और इस प्रकार सभी दिशाएं स्वच्छ रहती हैं.
4- निर्मल आकाश :- आसमान भी स्वच्छ होता है.
5- होत फूल फल ऋतु सबें :- देव उस स्थान का वायु-मंडल ऐसा विचित्र कर देते हैं, की सामान्यतः अलग-अलग ऋतुयों में खिलने वाले फल और फूल, अपने निज समय को छोड़ कर एक ही समय में फलने और खिलने लगते हैं.
6- पृथ्वी कांच समान :- देव, एक योजन तक की पृथिवी को त्रण-कंटक आदि रहित दर्पण के समान स्वच्छ कर देते हैं.
7- चरण कमल ताल कमल :- भगवान् के विहार के समय, देव उनके चरणों के नीचे स्वर्णमय कमल के फूल बनाते जाते हैं !
8- नभ ते जय जय वान :- देव, आकाश में भगवान् की जय-जयकार करते हैं.
9- मंद सुगंध बयार पुनि :- माने, शीतल, मंद सुगन्धित पवन का चलना, जिसके स्पर्श-मात्र से असाध्य रोगियों के रोग दूर हो जाया करते हैं.
10- गंधोदक की वृष्टि :- सुगन्धित जल की वर्षा होती रहती है.
11- भूमि विषै कंटक नहीं :- पवन कुमार जाति के देवों के द्वारा, वहाँ की भूमि पर कांटे, कंकड़ आदि चुभने वाले पदार्थ नहीं रहता.
12- हर्षमयी सब स्रष्टि :- चारों और हर्ष का वातावरण हो जाता है. समस्त जीव आनंदमयी हो जाते हैं.
13- धर्मचक्र आगे रहे :- सूर्य के समान चमकदार धर्मचक्र, विहार के समय देव उसे भगवान् के आगे आगे लेकर चलते हैं.
14- पुनि वसु मंगल सार :- छत्र, चमर, घंटा, ध्वजा, झारी, पंखा, स्वस्तिक, और दर्पण खंड, ये 8 मंगल द्रव्य हैं, जो भगवान् के निकट रखते हैं.
जैनम जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
१-अत्यंत सुन्दर रूप -सभी तीर्थंकर पूरे विश्व में सुन्दरतं होते है !
२-शरीर सुगन्धित होना-उनके शरीर से सुगग्ध आती है!हमारे शरीर मे पसीने के कारण बदबू आती है उनके नहीं आती!
३-पसीने का अभाव होना- उनके शरीर में पसीना नहीं आता
४-मल-मूत्र का अभाव-गृहस्थ जीवन में,उनके देवों द्वारा अमृतमय आहार लेने के कारण मल मूत्र नहीं होता!
५-मधुरवाणी-मधुर प्रिय वचन बोलते है!
६-अतुल्यबल- वे सर्व शक्तिमान होते है,उनके तुल्य कोई बलशाली नहीं होता!
७-उनका सफ़ेद खून होता है-जैसे माँ के बच्चे के वात्सल्य के कारण,उसके शरीर में सफ़ेद रंग का दूध स्वयं आ जाता है ठीक उसी प्रकार तीर्थंकर के तीन लोक के समस्त जीवों के प्रति वात्सल्य के कारण,उनके खून सफ़ेद होता है!
८-उनके शरीर में १००८ शुभ लक्षण के चिन्ह होते है-९०० तिल और १०८ शुभ बड़े चिन्ह होते है!
९-समचतुरस्रसंस्थान- उनके शरीर का आकार आंखे,नाक,कान,नक्श आदि सर्वश्रेष्ठ होता है लगता है, जैसे किसी ने उनका सुन्दरतं निर्माण किया हो!
१०-वज्रऋषभनारांचसहनं-इनके शरीर में हड्डिया वज्र की होती है,कुछ भी कर ले टूटेगी नहीं!
ये गुण उनमे जन्म से इसलिए होते है क्योकि पिछले जन्म में उन्होंने सोलह कारण भावनाए भा कर तीर्थंकर प्रकृतिबंध कर महान पुन्य का संचय किया होता है!
तीर्थंकर भगवान् जब गर्भ मे आते है,तो उससे पूर्व स्वर्ग से सौधर्मेन्द्र आकर उनकी नगरी को पुन: बनाते है!माता-पिता वही रहते है!गर्भ में आने से छ माह पूर्व से लेकर, माता -पिता के महल के आँगन में दिन मे चार बार प्रात:,अपराह्न,सायं और रात्रि में साढ़े तीन करोड़ असली,अत्यंत मूल्यवान,रत्नों की वर्षा,प्रत्येक समय, उनके जन्म लेने तक अर्थात १५ माह देवता करते है जिससे,जिस नगरी में भगवान् जन्म लेने जा रहे है वह नगरी मालामाल हो जाए!समस्त प्रजा आकर रत्नों को ले जाती है!
(2). केवलज्ञान के दसगुण-अतिशय-
१-१००योजन=३२० किलोमीटर के वृत्ताकार क्षेत्र तक सुभिक्ष हो जाता है अर्थात अकाल नहीं पड़ सकता! लोगों को खाने-पीने की कमी नहीं आयेगी!
२-केवलज्ञान के बाद जमीन पर नहीं चलते,आकाश में गमन करते है !
३-समवशरण में विराजमान होने पर,यद्यपि पूर्व की ऒर ही उनका एक मुख होता है,किन्तु प्रत्येक व्यक्ति को उनके चार मुख दिखाई देते है!
४-किसी भी जीव की हिंसा नहीं होती!उनके शरीर सेकोई जीव स्पर्श कर जाए तो मरता नहीं है!५-उनके ऊपर कोई उपसर्ग नहीं कर सकता!उनके ऊपर कोई आपत्ति नहीं आ सकती ,उनकी १०० इंद्रा हमेशा सेवा मे रहते है!
६-वे ,कवलाहार नहीं करते,उन्हें भूख,प्यास लगनी सब बंद हो जाती है! तीर्थंकर भगवान् आदिनाथ ३००० फीट लम्बे थे ,संख्यों वर्षों तक केवली अवस्था में रहे, भगवन महावीर के लम्बाई १०.५ फीट ,३० वर्ष केवली रहे थे !उन्हें भूख ही नहीं लगती क्योकि हमारे आपके शरीर के सामान,केवलज्ञान के बाद उनके शरीर मे परम औदरिक होने के कारण कीड़ों का वास नहीं होता !इसलिए वे उनके शरीर से भोजन लेकर उसका हुन्नास depreciation नहीं करते!अत: उन्हें भोजन की आवश्यकता नहीं होती!
७-समस्त विद्याओं के स्वामी हो जाते है!
८- अब इनके नाखून और सिर के केश बढ़ना बंद कर देते है! गृहस्थ जीवन मे तीर्थंकर के बाल केवल इतने बढ़ते है की उन्हें किसी से कटवाना नहीं पड़ता !
९-उनकी पलकें नहीं झपकती क्योकि उनके अन्तरायकर्म का नाश हो जाता है जिससे उनकी शक्ति प्रगट हो जाती है,जिससे उनकी पलकों का झपकना बंद हो जाता है!हमारी पलके थकान के कारण झपकती है!
१०-उनके शरीर से करोडो सूर्य और चद्रमा की कान्ति के तुल्य प्रकाश निकलता है, जिससे उनकी परछाई नहीं पड़ती!
तीर्थंकर के केवल ज्ञान होते ही प्रथ्वी से ५००० धनुष ऊपर अर्थात ३० हजार फीट ऊपर उठ जाते है,इंद्र आकर उनके सम्वशरण की रचना करते है!
(3). १४ देवकृत अतिशय-अर्थात देवों के द्वारा की गयी विशेषताए-
१-अर्द्धमागधीभाषा का होना-देव भगवान् के उपदेश को समवशरण में इस प्रकार फैलाते है की वहां बैठे सभी प्राणी सामान स्पष्टता के साथ सुन सके!अर्थात १२ सभाओं में आगे-पीछे बैठा जीव भी भाषा को बराबर स्पष्टता से सुनता है!किसी भी जीव को कम अथवा डिस्टर्बेंस के साथ नहीं सुनायी पड़ता ! भगवान् की दिव्यध्वनि ॐकार रूप होती है!जैसे ॐ ॐ --!स्वभाव से प्रत्येक जीब,(तिर्यन्चों सहित), को समझ में आने वाली होती है! ७१८ भषाओं में होती है!
२- सब जीवों मे मित्रता-समवशरण में तिर्यन्चों मे गाय/शेर सभी आते है किन्तु उनमे रंचमात्र बैर नहीं होता!
३-आकाश देवों द्वारा सदा निर्मल रखा जाता है ऐसा नहीं कभी वर्षा हो गयी,आंधी आ गयी!
4-दिशाओं को निर्मल रखा जाता है
५- समस्त ऋतुओं के फल फूल वृक्षों मे एक साथ फलने के कारण,लग जाते है चाहे कोई भी ऋतू हो!
६-पृथ्वी कांच के सामान चमकदार -धुल,कंकड़ ,पत्थर रहित होती है!
७-कमलों की रचना-भगवान् के विहार करते समय भगवन के चरण के नीचे देव २२५ स्वर्ण कमलों की रचना करते है!
८-आकाश में देवतागण भगवान् की जय जयकार का नाद करते हुए चलते है!
९-मंद सुगन्धित ठंडी ठंडी सुहावनी पवन का बहना!
१०-सुगन्धित जल की हल्की हल्की बुँदे आकाश से गिरती रहती है!
११-भूमि पर कांटे,कंकड़ .पत्थर आदि हुछ नहीं रहते !
१२-आनंदमय होना -किसी को मारता नहीं,पिटाई नहीं करता !
१३-भगवान् के विहार के समय वृत्ताकार प्रकाशमान, सहस्र आड़े वाला धर्मचक्र चलता है!
१४-अष्ट मंगल द्रव्य होते है
इस प्रकार देवों द्वारा केवली भगवान् के १४ अतिशय किये जाते है!
(4). अरिहंत परमेष्ठी के अष्ट प्रातिहार्य-
१-अशोकवृक्ष-२-पुष्पवृष्टि होना,३-दुंदभी-देवताओं द्वारा नगाड़े बजाना,४-सिंहासन-मणियों का सिंहासन होना,५-दिव्यध्वनी,६-भामंडल,७-तीन छत्र,८-चौसठ चंवर!
जैन धर्म के अनुसार, अष्ट प्रातिहार्य (आठ विशेष शोभाएँ) वे आठ चमत्कारी वस्तुएँ या घटनाएँ हैं जो तीर्थंकरों को केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद समवसरण में प्राप्त होती हैं, और वे हैं: अशोक वृक्ष, तीन छत्र, भामंडल (प्रभामंडल), चामर (चौंसठ), सिंहासन, देवदुंदुभि, पुष्पवृष्टि, और दिव्यध्वनि.
ये अष्ट प्रातिहार्य इस प्रकार हैं:
अशोक वृक्ष: शोक (दुःख) को हरने वाला वृक्ष, जो भगवान के ऊपर होता है.
तीन छत्र: सिर के ऊपर सुशोभित तीन छत्र (छत्रत्रय).
भामंडल: भगवान के पीछे मुख पर तेज़ को समेटने वाला प्रभामंडल.
चामर: चौंसठ (64) चंवर (पंखे) जो यक्षों द्वारा ढोए जाते हैं.
चामर प्रातिहार्य: आठ दिव्य जोड़े तीर्थंकर को मूँछ जैसे यंत्रों (चमर) से पंखा झलते हैं । जिस प्रकार चमर को नीचे की ओर और फिर ऊपर की ओर ले जाया जाता है, वह इस बात का प्रतीक है कि जो आत्माएँ शुद्ध भावों से परिपूर्ण होकर भगवान के चरणों में भक्तिपूर्वक अपना सिर झुकाती हैं, वे ऊर्ध्व गति प्राप्त करती हैं।
सिंहासन: रत्नजड़ित सिंहासन, जिस पर भगवान विराजते हैं.
देवदुंदुभि: देवताओं द्वारा बजाए जाने वाले ढोल (नगाड़े).
पुष्पवृष्टि: देवताओं द्वारा की जाने वाली फूलों की वर्षा (सुरपुष्पवृष्टि).
दिव्यध्वनि: भगवान के मुख से निकलने वाली पवित्र वाणी.
महत्व:
ये वस्तुएँ केवल सजावट के लिए नहीं, बल्कि अरिहंत भगवान के दिव्य वैभव और शुभता को दर्शाती हैं, और पूजा-अर्चना में इनका प्रयोग आध्यात्मिक महत्व रखता है।
(5). अरिहंत परमेष्ठी के अनंत चतुष्टय-
अनंत चतुष्टय-अनंत (ज्ञान,दर्शन,सुख,और वीर्य)चार चतुष्टय होते है!
अर्हन्त परमेष्ठी और तीर्थंकर में अंतर-जिनको केवलज्ञान होता है किन्तु कल्याणक नहीं होते वे सामान्य केवली/केवली होते है!
जिनके कल्याणक होते है वे तीर्थंकर केवली होते है!
भगवान् बाहुबली अरिहंतपरमेष्ठी थे महावीर भगवान् अरिहंतपरमेष्ठी में तीर्थंकर थे!
तीर्थंकरों की १०० इंद्र वंदना करते रहते है!
ये ४६ अतिशय तीर्थंकर अर्हिंतों के होते है
किन्तु सामान्य अर्हिंत के जन्मों के अतिशय तो होंगे नहीं और भी कुछ कम हो जाते है!
तीर्थंकर २,३,५ कल्याणक के भेद से तीन प्रकार के होते है!
भरत और ऐरावत क्षेत्र मे तीर्थंकर पञ्च कल्याणक वाले और विदेह मे तीनों कल्याणक वाले होते है!
वर्तमान में विदेह क्षेत्र मे सीमंधर,युगमंदर आदि २० भगवान् विराजमान है और ये वहां सदा विराजमान रहेंगे
अब श्रीमत् भगवान् धरसेनाचार्य गुरु के मुख से उपलब्ध ज्ञान को भव्यजनों में वितरित करने के लिए पंचमकाल के अन्त में वीरांगज मुनि पर्यन्त इस ज्ञान को ले जाने की इच्छा से, पूर्वाचार्यों की व्यवहार परम्परा के अनुसार, शिष्टाचार का परिपालन करने के लिए, निर्विघ्न सिद्धान्त शास्त्र की परिसमाप्ति आदि हेतु को लक्ष्य में रखते हुए श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्य के द्वारा णमोकार महामंत्र मंगल गाथा सूत्र का अवतार किया जाता है-
णमो-नमस्कार होवे। किन्हें नमस्कार हो ? अरिहंतों को। इसी प्रकार से पाँचों पदों में जानना चाहिए कि सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को, सर्वसाधुओं को नमस्कार हो।
सर्वनमस्कारों में यहाँ सर्व और लोक इन दो शब्दों को अन्त्यदीपक न्याय के अनुसार अध्याहार-अधिक रूप से ग्रहण कर लेना चाहिए जो सम्पूर्ण क्षेत्रगत तीनों कालों में होने वाले अर्हन्तादि देवताओं के प्रणमन के सूचक हैं। इस न्याय से
‘‘णमो अरिहंताणं’’ इस पद का अर्थ है कि ढाई द्वीपों की एक सौ सत्तर कर्मभूमियों में होने वाले भूत-भावि-वर्तमान संबंधी त्रैकालिक समस्त अर्हंत परमेष्ठियों को नमस्कार हो।
‘‘णमो सिद्धाणं’’ का अर्थ है कि समस्त कर्मभूमियों से सिद्ध पद प्राप्त निकल परमात्माओं को तथा संहरण सिद्ध की अपेक्षा से भी-उपसर्गादि से सिद्ध पद जिन्हें प्राप्त हुआ है ऐसे ढाईद्वीप और दो समुद्रों से तीनों कालों में जितने भी सिद्ध हुए हैं, हो रहे हैं, होंगे उन सभी सिद्ध परमेष्ठियों को नमस्कार हो।
‘‘णमो आइरियाणं’’ पद का भी यही अर्थ है कि सम्पूर्ण कर्मभूमियों में उत्पन्न त्रिकालगोचर समस्त आचार्य परमेष्ठियों को नमस्कार हो।
‘‘णमो उवज्झायाणं’’ का मतलब है कि समस्त कर्मभूमियों में तीनों कालों में उत्पन्न होने वाले सभी उपाध्याय परमेष्ठियों को नमस्कार हो।
‘‘णमो लोए सव्वसाहूणं’’ इस अंतिम पद का अर्थ है कि सभी कर्मभूमियों में उत्पन्न त्रि काल गोचर सम्पूर्ण साधु परमेष्ठियों को मेरा नमस्कार होवे।
अरिहंतों को नमस्कार हो-अरि अर्थात् मोह कर्म, मोहनीय कर्म के बिना शेष सातों कर्म संसार में संसरण कराने में कारण नहीं होते हैं अत: उस मोहकर्म रूपी शत्रु का हनन करने वाले अरिहंत कहलाते हैं अथवा ‘रज’ अर्थात् आवरण कर्मों को नाश कर देने से ‘अरिहंत’ यह संज्ञा प्राप्त होती है।
ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म धूलि की तरह बाह्य और आभ्यन्तर दोनों गुणों को ढक लेते हैं इसलिए इन्हें रज कहा है। मोह को भी रज कहते हैं। उन
ज्ञानावरण, दर्शनावरण कर्मों का नाश करने से अरिहंत हैं।
अथवा ‘रहस्य’ के अभाव से भी अरिहंत होेते हैं। रहस्य अन्तराय कर्म को कहते हैं। अन्तराय कर्म का नाश शेष तीन घातिया कर्मों के नाश का अविनाभावी है, ऐसे अन्तराय कर्म के नाश से अरिहंत होते हैं।
अर्थात् अन्तराय कर्म के साथ-साथ शेष ज्ञानावरण, दर्शनावरण और मोहनीय ये तीनों कर्म नियम से नष्ट होते ही हैं वे अघातिया कर्म भी भ्रष्ट बीज के समान शक्तिहीन हो जाते हैं।
मोहनीय कर्म, ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन चार घातिया कर्मों की सैंतालीस प्रकृतियाँ,
नरकायु-तिर्यंचायु-देवायु ये आयुकर्म की तीन प्रकृतियाँ,
नामकर्म की नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगति-तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, विकलत्रय (द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय), उद्योत-आतप-एकेन्द्रिय-साधारण-सूक्ष्म-स्थावर ये तेरह प्रकृतियाँ
इस प्रकार कुल त्रेसठ प्रकृतियों के विनाश से तेरहवें गुणस्थानवर्ती केवली भगवान अरिहंत परमेष्ठी होते हैं।
अथवा
‘‘अरहंताणं’’ ऐसा पाठान्तर प्राप्त होने पर ‘‘सातिशय पूजा के योग्य होने से अर्हन्त होते हैं।
स्वर्गावतरण-स्वर्ग से च्युत होकर माता के गर्भ में आने से लेकर पंच महाकल्याणकों में सौधर्मादि इन्द्रों के द्वारा की जाने वाली पूजा के योग्य होने से अर्हन्त संज्ञा भी सार्थक है।
चौंतीस अतिशय, अष्टमहाप्रातिहार्य, अनन्त चतुष्टयरूप छियालिस गुण समन्वित और अठारह दोष रहित सर्वज्ञ, सर्वदर्शी अर्हन्त भगवान् होते हैं।
अथवा धवला ग्रंथ के टिप्पण में ‘अरुहंताणं’ यह पाठान्तर भी आया है जिसका अर्थ है.......पुन: उत्पन्न न होने वाले क्षीणशक्ति वाले बीज की तरह से जिनके कर्म भी अत्यन्त क्षीण हो गये हैं। कहा भी है-
जिस प्रकार बीज के जल जाने पर उसमें से पुन: अंकुर उत्पन्न नहीं होता है, उसी प्रकार कर्मरूपी बीज के भी दग्ध हो जाने पर भवरूपी अंकुर नहीं उगता है।
इसलिए जिनका पुनर्जन्म संसार में नहीं होगा, ऐसे अरहन्तों को अरुहन्त संज्ञा भी किन्हीं के द्वारा प्रदान की गई है।
श्री बुधजन कवि द्वारा वर्णित चौंतिस अतिशय जो प्रसिद्ध हैं ही, जो जन्म के १०, केवलज्ञान के १० और देवकृत १४ रूप जाने जाते हैं, किन्तु तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ के आधार से इन अतिशयों में किंचित् भेद देखा जाता है। जैसे-
णिस्सेदत्तं णिम्मलगत्तत्तं दुद्धधवलरुहिरत्तं।
आदिमसंहडणत्तं, समचउरस्संगसंठाणं।।८९६।।
अणुवमरूवत्तं णव, पंचयवरसुरहिगंधधारित्तं।
अट्ठुत्तरवरलक्खण, सहस्सधरणं अणंतबलविरियं।।८९७।।
मिदहिदमधुरालाओ, साभाविय अदिसयं च दसभेदं।
एदं तित्थयराणं, जम्मग्गहणादिउप्पण्णं।।८९८।।
अर्थात्
१. स्वेदरहितता
२. निर्मलशरीर
३. दूध के समान धवल रुधिर
४. वज्रवृषभ नाराचसंहनन
५. समचतुरस्र संस्थान
६. अनुपम रूप
७. नवचम्पक की उत्तम गंध के समान गंध का धारण करना
८. एक हजार आठ उत्तम लक्षणों को धारण करना
९. अनन्तबल
१०. हितमित मधुर भाषण ये स्वाभाविक दस अतिशय तीर्थंकर पदधारी अर्हन्तों के जन्म ग्रहण से ही उत्पन्न हो जाते हैं।
पुन: केवलज्ञान के ११ अतिशय कहे गये हैं-
१. अपने पास से चारों दिशाओं में एक सौ योजन तक सुभिक्षता
२. आकाशगमन
३. हिंसा का अभाव
४. भोजन का अभाव
५. उपसर्ग का अभाव
६. सबकी ओर मुख करके स्थित होना
७. छाया रहितता ८. निर्निमेष दृष्टि
९. विद्याओं की ईशता-स्वामीपना
१०. सजीव होते हुए भी नख और रोमों का समान रहना
११. अठारह महाभाषा,
सात सौ क्षुद्र भाषा तथा और भी जो संज्ञी जीवों की समस्त अक्षर-अनक्षरात्मक भाषाएँ हैं। उनमें तालु, दन्त, ओष्ठ और कण्ठ के व्यापार से रहित होकर एक ही समय भव्यजनों को दिव्य उपदेश देना। भगवान् जिनेन्द्र की स्वभावत: अस्खलित और अनुपम दिव्यध्वनि तीनों संध्याओं में नव मुहूर्तों तक निकलती है और एक योजन पर्यन्त जाती है। इसके अतिरिक्त गणधर देव, इन्द्र अथवा चक्रवर्ती के प्रश्नानुरूप अर्थ के निरूपणार्थ वह दिव्यध्वनि शेष समयों में भी निकलती है। यह दिव्यध्वनि भव्य जीवों को छह द्रव्य, नौ पदार्थ, पाँच अस्तिकाय और सात तत्त्वों का नाना प्रकार के हेतुओं द्वारा निरूपण करती है। इस प्रकार घातिया कर्मों के क्षय से उत्पन्न हुए ये महान आश्चर्यजनक ग्यारह अतिशय तीर्थंकरों को केवलज्ञान के उत्पन्न होने पर अर्हन्त अवस्था में प्रगट होते है
अब देवकृत १३ अतिशय बताते हैं-
१. तीर्थंकरों के माहात्म्य से संख्यात योजनों तक वन असमय में ही पत्र, फूल और फलों की वृद्धि से संयुक्त हो जाता है|
२. कंटक और रेती आदि को दूर करती हुई सुखदायक वायु चलने लगती है,
३. जीव पूर्व वैर को छोड़कर मैत्रीभाव से रहने लगते हैंं,
४. उतनी भूमि दर्पण तल के सदृश स्वच्छ और रत्नमय हो जाती है,
५. सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से मेघकुमार देव सुगंधित जल की वर्षा करता है,
६. देव विक्रिया से फलों के भार से नम्रीभूत शालि और जौ आदि सस्य को रचते हैं,
७. सब जीवों को नित्य आनन्द उत्पन्न होता है,
८. वायुकुमार देव विक्रिया से शीतल पवन चलाता है,
९. कूप और तालाब आदिक निर्मल जल से पूर्ण हो जाते हैं,
१०. आकाश धुआँ और उल्कापातादि से रहित होकर निर्मल हो जाता है,
११. सम्पूर्ण जीवों को रोगादि की बाधाएं नहीं होती हैं,
१२. यक्षेन्द्रों के मस्तकों पर स्थित और किरणों से उज्ज्वल ऐसे चार दिव्य धर्मचक्रों को देखकर जनों को आश्चर्य होता है,
१३. तीर्थंकरों के चारों दिशाओं में (विदिशाओं सहित) छप्पन सुवर्णकमल, एक पादपीठ और दिव्य एवं विविध प्रकार के पूजन द्रव्य होते हैं
इस प्रकार ये १०+११+१३=३४ अतिशय अर्हन्त भगवन्तों के होते हैं तथा अशोक वृक्ष, तीनछत्र, सिंहासन, दिव्यध्वनि, देवदुन्दुभि, पुष्पवृष्टि, प्रभामण्डल और चौंसठ चंवर ये आठ प्रातिहार्य भी उन जिनेन्द्रों के पाये जाते हैं।
जो उपर्युक्त चौंतीस अतिशयों को प्राप्त हैं, अष्टमहाप्रातिहार्यों से संयुक्त हैं, मोक्षमार्ग के प्रणेता हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं ऐसे अर्हन्त परमेष्ठी को मेरा मन, वचन, काय से नमस्कार होवे।