महामृत्युंजय चालीसा


दोहा-


परमेष्ठी जिन पाँच हैं, तीर्थंकर चौबीस । मृत्युञ्जय हम पूजते, चरणों में धर शीश ॥


(चौपाई)


कर्म चार औषधियों को मारते हैं, इसलिए तुम पात्र कहलाते हो। 1।।


अनन्त चतुष्टय जो प्रगटाए, दर्शन ज्ञान-वीर्य सुख पाए ।।2।।


दोष अठारह पूर्ण नशाए, छियालिस गुणधारी कहलाए ॥3॥


चौतिस अतिशय जिनने पाए, प्रातिहार्य आठों प्रगटाए ॥4॥


समवशरण शुभ देव रचाए, खुश हो जय-जयकार लगाए ।। 5 ।।


समवशरण की शोभा न्यारी, उससे भी रहते अविकारी ।।6।।


देव शरण में प्रभु के आते, चरण-कमल तल कमल रचाते ।।7 ।।


सौ योजन सुभिक्षता होवे, सब प्रकार की आपद खोवे ॥8॥


भक्त शरण में जो भी आते, चतुर्दिशा से दर्शन पाते ॥9॥


गगन गमन प्रभु जी शुभ पाते, प्राणी मैत्री भाव जगाते ।।॥10॥


प्रभो ! ज्ञान के ईश कहाए, अनिमिष दृग प्रभु के बतलाए ।।11।।


भगवान दिव्य शिक्षाएँ सुनाते हैं और देवता, मनुष्य और पशु उन्हें सुनकर आनन्दित होते हैं।


मृत्युंजय जो भगवान् कहलाते हैं, वे मृत्यु को जीतकर शिवपद को प्राप्त करते हैं ॥13॥


ज्ञान अनन्त दर्श सुख पाते, वीर्य अनन्त प्रभू प्रगटाते ।। 14 ।।


सिद्ध सनातन आप कहाए, सिद्धशिला पर धाम बनाए ।॥15॥


अनुपम शिवसुख पाने वाले, ज्ञान शरीरी रहे निराले ॥16॥


नित्य निरंजन जो अविनाशी, गुण अनन्त की हैं प्रभु राशी ।। 17 ॥


तुमने उत्तम संयम पाया, जिसका फल यह अनुपम गाया ।। 18 ।।


रत्नत्रय पा ध्यान लगाया, तप से निज को स्वयं तपाया ।। 19 ।।


कई ऋद्धियाँ तुमने पाईं, किन्तू वह तुमको न भाईं ।॥20॥


उनसे भी अपना मुख मोड़ा, मुक्ति वधू से नाता जोड़ा ।।21 ।।


सहस्र आठ लक्षण के धारी, आप बने प्रभु मंगलकारी ।।22 ।।


हजार आठ शुभ नाम, सभी सार्थक नाम समझाए गए हैं। 23।


नाम सभी शुभ मंत्र कहाए, जो भी इन मंत्रों को ध्याए ।॥24॥


सुख-शांती सौभाग्य जगाए, अपने सारे कर्म नशाए ।।25 ।।


विषय भोग में नहीं रमाए, रत्नत्रय पा संयम पाए ।।26 ।।


तीन योग से ध्यान लगाए, निज स्वरूप में वह रम जाए ।।27 ।।


संवर करें निर्जरा पावे, अनुक्रम से वह कर्म नशावे ।।28 ।।


बीजाक्षर भी पूजें ध्यावें, जिनपद में नित प्रीति बढ़ावें ।।29 ।।


कभी मंत्र जपने लग जाए, कभी प्रभू को हृदय बसाए ।।30 ।।


स्वर व्यंजन आदी भी ध्याए, अतिशय कर्म निर्जरा पाए ॥31॥


पुण्य प्राप्त करता शुभकारी, शिवपथ का कारण मनहारी ।।32 ।।


इस भव का सब वैभव पाए, उसके मन को वह न भाए ।॥33॥


तजकर जग का वैभव सारा, जिनने भेष दिगम्बर धारा ।।34 ।।


वह बनते त्रिभुवन के स्वामी, हम भी बने प्रभू अनुगामी ।।35 ।।


यही भावना रही हमारी, कृपा करो हम पर त्रिपुरारी ॥36॥


मृत्युञ्जय हम भी हो जाएँ, इस जग में अब नहीं भ्रमाएँ ।।37 ।।


जागे अब सौभाग्य हमारा, मिले चरण का नाथ सहारा ॥38 ॥


शिव पद जब तक ना पा जाएँ, तब तक तुमको हृदय सजाएँ।॥39॥


नित-प्रति हम तुमरे गुण गाएँ, पद में सादर शीश झुकाएँ ।।40 ।।


दोहा-


चालीसा चालीस दिन, पढ़े भाव के साथ।


सुख-शांति आनन्द पा, बने श्री का नाथ ।।


सुत सम्पत्ति सुगुण पा, होवे इन्द्र समान।


'विषाद' होकर, मृत्यु पर विजय पाकर, वह निर्वाण की अवस्था को प्राप्त करता है।


जप्या: ॐ ह्रीं अर्ह झम्


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