परम पूज्य प्रज्ञा श्रमणी वात्सल्यनिधि जिनधर्म प्रभाविका आर्यिका रत्न105 डॉ ज्ञेयश्री माताजी का चातुर्मास सुसनेर मध्यप्रदेश में हो रहा हैं
(3) *एक चिंतन*
*_ग्रंथों में लिखा गया है कि यदि मनुष्य मौन रहना सीख ले तो उसकी अधिकांश समस्याएं स्वयं ही समाप्त हो जाती है और सत्य में मौन में बड़ी शक्ति होती है, बड़ा बल होता है !_*
*_किन्तु वो बल किस काम का जो समय आने पर आपके काम ही ना आये। क्या सदा मौन रहना उचित है? नहीं, इतिहास साक्षी है संसार में अधिक विपदायें इसलिए आयी क्योंकि समय पड़ने पर मनुष्य उसका विरोध नहीं कर पाया, मौन रहा !_*
*_यदि मौन रहना शस्त्र है तो उसका सही समय पर उपयोग करना भी आवश्यक है। यदि अकारण मौन रहोगे तो बुरे तत्व उसे सहमति समझ लेते है फिर धीरे-धीरे वो आपका स्वभाव बन जाता है, आपका अभ्यास हो जाता है और फिर आपका व्यक्तित्व एक साधारण से पाषाण की भांति बन जाता है !!_*
*_अपनी वाणी का आवश्यकता पड़ने पर सदुपयोग कीजिये, वाणी को कब वश में रखना है और कब मौन नहीं रहना है इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है ये समझना कि उसे कब तोडना है ?_*